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बाबा कीनाराम B79

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   🌺हिंगलाज देवी की आराधना और देवी का आशीर्वाद 🌺   एक बार महाराज श्री कीनाराम जूनागढ़ से चलकर कच्छ की खाड़ियों और दलदलों को , जहां जाना असम्भव है , अपने खड़ाऊं से पार कर हिंगलाज पहुंचे , जो करांची से 45 मील की दूरी पर अवस्थित है । हिंगलाज की देवी ( हिंगलाज देवी का मंदिर अब पाकिस्तान में है और स्थानीय लोग उन्हें " बीबी - नानी " के नाम से जानते हैं । ) के मन्दिर से कुछ ही दूर धूनी लगाये और तपस्यारत महाराज श्री कीनाराम को एक कुलीन घर की महिला के रूप में हिंगलाज देवी स्वयं प्रतिदिन भोजन पहुंचाती रही । इनकी धूनी की सफाई , 10 - 11 वर्ष के एक बटुक के रूप में , भैरव स्वयं किया करते थे । एक दिन महाराज श्री कीनाराम ने पूछ दिया - " आप किसके घर की महिला हैं ? आप बहुत दिनों से मेरी सेवा में लगी हुई हैं।आप अपना परिचय दीजिये नहीं तो मैं आपका भोजन ग्रहण नहीं करूंगा ।  " मुस्कुरा कर हिंगलाज देवी ने महाराज श्री कीनाराम को दर्शन दिया और कहा - " जिसके लिए आप इतने दिनों से तप कर रहे हैं , वही मैं हूं । मेरा भी समय हो गया है । मैं अपने नगर काशी में जाना चाहती हूं । अब आप जाइये और ...

क्षणिक जीवन B78

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                        🕉️🌷 औघड़ वाणी 🌷 🔱🚩 अपने तरह की अनोखी संयुक्त परिवार की व्यवस्था आज नारियों की संकीर्ण मानसिकता के कारण बड़ी तेजी से टूटती जा रही है । पुरुष वर्ग इनकी कलहपूर्ण जिद्दी मानसिकता के समक्ष अपने को पूर्णतः असहाय समझते हुए बड़ी कराह के  साथ पारिवारिक विघटन के कारुणिक एवं दुःखद दृश्य को  देखने के लिये विवश है ।🔱- अघोर वचन शास्त्र - पृष्ठ  274

गुरु आशीर्वचन B77

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            🔯🔱🌷अति विशिष्ट आशीर्वचन  🌷🔱🔯 🌷गुरु पूर्णिमा महोत्सव  14 जुलाई 1992 के पावन - पुनीत अवसर  पर श्रद्धालु - भक्तों के निमित न्यूयार्क , अमेरिका से प्रेषित 🚩परमपूज्य अघोरेश्वर महाप्रभु का आशीर्वचन 🚩     🔱🌼  स्वानुकूल हो निष्कंटक जीवन  जियें  🌼🔱     🔯 जब भी हम रचनात्मक कृत्यों के लिए एकसाथ उठते - बैठते हैं , बात - व्यवहार करते हैं , उस  समय उस अज्ञात के प्रति अपनी वचन - बद्धता को पूरा करते हैं। अगर हमारी बुद्धि सही है तो हमारे सारे कर्म ठीक हैं । बुद्धि  और मस्तिष्क का एक दूसरे से गहरा सम्बन्ध है ।यदि इस बात से हम नहीं चेत पाते हैं तो जीवन में बहुत भटकाव हो जाता है। यदि दोनों हिल - मिल के रहें तो हमारे पांव स्वतः प्रगति  की तरफ अग्रसर होते हैं ।  हमारा जीवन तभी सार्थक है जब हम क्रियाशील होते हैं ।  क्षण भर की जड़ता भी जीवन की  यात्रा को बहुत लम्बी बना देती है। 🏵 पृथ्वी की तरह जो सदा  गतिशील होता वह अपने जीवन में मधुरता लाता है और   दूसरों को भी...

कम बोलो उचित बोलो B76

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 एक राजा के घर एक राजकुमार ने जन्म लिया। राजकुमार स्वभाव से ही कम बोलते थे। राजकुमार जब युवा हुआ तब भी अपनी उसी आदत के साथ मौन ही रहता था। राजा अपने राजकुमार की चुप्पी से परेशान रहते थे, कि आखिर ये बोलता क्यों नहीं है। राजा ने कई ज्योतिषियों, साधु-महात्माओ एवं चिकित्सकों को उन्हें दिखाया परन्तु कोई हल नहीं निकला। संतो ने कहा कि ऐसा लगता है पिछले जन्म में ये राजकुमार कोई साधु थे जिस वजह से इनके संस्कार इस जन्म में भी साधुओं के मौन व्रत जैसे हैं। राजा ऐसी बातों से संतुष्ट नहीं हुए। एक दिन राजकुमार को राजा के मंत्री बगीचे में टहला रहे थे। उसी समय एक कौवा पेड़ कि डाल पे बैठ कर काँव-काँव करने लगा। मंत्री ने सोचा कि कौवे की आवाज से राजकुमार परेशान होंगे, इसलिए मंत्री ने कौवे को गोली मार दी। गोली लगते ही कौवा जमीन पर गिर गया। तब राजकुमार कौवे के पास जा कर बोले कि यदि तुम नहीं बोले होते तो नहीं मारे जाते। इतना सुन कर मंत्री बड़ा खुश हुआ कि राजकुमार आज बोले हैं और तत्काल ही राजा के पास ये खबर पहुंचा दी। राजा भी बहुत खुश हुआ और मंत्री को खूब ढेर सारा उपहार दिया। कई दिन बीत जाने के बाद भी राजकु...

गुरु एवं संध्या आरती का महत्व B75

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                           🔱  औघड़ वाणी  🚩 संध्या को चिराग जलाने तथा धूप और आरती करने का महत्व ! " अब संध्या का समय हो गया है। सब लोग अंधकार को छोड़कर प्रकाश की ओर बढ़ने के लिए चिराग जलायेंगे और आरत होकर आरतियाँ भी करेंगे। परमात्मा से यह प्रार्थना करेंगे कि हे परमात्मा! ------  हमारे हृदय में छाये अंधकार को दूर करने के लिए ऐसा दीपक जलाओ जिससे अपने अंधकार को दूरकर दूसरों को भी अच्छे विचारों, गुणों, चरित्र तथा व्यवहारों और सद्कार्यों से मैं प्रकाशित कर सकूँ। इसलिये संध्या को यह दीपक जलाया जाता है। आरती, धूप, दीप, नैवेद्य से हमें यही प्रेरणा मिलती है। संध्या के समय पूजा-प्रार्थना इसीलिये की जाती है कि हमारी रात्रि बुरी आत्माओं को छोड़कर अच्छी आत्माओं का सानिध्य प्राप्त करें और अच्छी आत्मायें हमारे पुत्र-पौत्र, पिता-पितामह तक का मुझे स्मरण दिलायें और उन लोगों का भी यदि कहीं बुरी आत्माओं से संग हो तो वह आत्मायें छोड़कर भागें। "                         ...

बाबा किनाराम भाग-३ B74

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               🌹:अघोर साधक बाबा कीनाराम:🌹                                                                    भाग --03  बाबा कीनाराम शिवाला स्थित क्रीमकुण्ड स्थल में साधना में प्रायः लीन रहा करते थे। क्रीमकुण्ड का द्वार और राजा चेत सिंह के किले का मुख्य द्वार करीब 400 मीटर की दूरी पर था। राजा बलवन्त सिंह की मृत्यु 1770 में हो जाने के बाद बाबा बहुत दुःखी हुए थे क्योंकि वह बाबा के परम भक्तों में से थे। उसके बाद बाबा को राज-परिवार से कोई विशेष् रूचि नहीं रह गयी थी। राजा चेतसिंह राजा बलवन्त सिंह के नजदीकी रिश्तेदार थे। रानी पन्ना कुंवर के पुत्र गद्दी पर बैठे, वैसे राजा चेतसिंह गद्दी पर बैठना चाहते थे। लेकिन जब ऐसा नहीं हो पाया तो राजा चेतसिंह ने शिवाला स्थित किले को अपना निवास स्थान बना लिया। आज भी वह किला राजा चेतसिंह के नाम से प्रसिद्ध है।       बाबा कीनाराम एक ...

बाबा किनाराम भाग-२ B73

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               --------:अघोर साधक बाबा कीनाराम:-------                       🙏🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🙏                                                                         भाग--02               पूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन एकाएक बाबा कालूराम रुक गए और पलटकर गंगा की ओर देखकर बोले--कीनाराम, देख, कोई शव बहा जा रहा है। कीनाराम तुरन्त बोले--नहीं बाबा, वह जिन्दा है।  तो बुला उसे। कीनाराम वहीँ से चिल्लाकर बोले--इधर आ, कहाँ बहता जा रहा है ? तत्काल वह शव विपरीत दिशा में घूमा और घाट के किनारे आ लगा। फिर धीरे-धीरे उठा और फिर पूरी ताक़त बटोर कर खड़ा हो गया सामने आकर हाथ जोड़कर, मूकवत। कीनाराम बोले--खड़ा-खड़ा मेरा मुंह क्या देख रहा है ? जा अपने घर, तेरी माँ रो-रो कर पागल हो रही है। ...

बाबा किनाराम भाग-१ B72

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                 ------:अघोर साधक बाबा कीनाराम:-------                                    🙏🌹🌹🌹🌹🌹🙏                                                                           भाग--01    यह घटना 1757 की है जब एक महान् अघोर साधक अपने गुरु को खोजते- खोजते गिरिनार की लम्बी यात्रा करते हुये काशी के हरिश्चन्द्र घाट के महाश्मशान पहुंचे। चुपचाप एक कोने में बैठे हुए अपने गुरु को निहार रहे थे। उनके नेत्र सहसा ही गीले हो गए थे। बस, वे जानना चाह रहे थे कि गुरु उन्हें पहचानते भी हैं या नहीं।        प्रातःकाल का समय था। सर्द हवा पूरी तेजी से चल रही थी। भगवान् भास्कर धीरे-धीरे नीले आकाश में अपनी सिन्दूरी आभा बिखेर रहे थे। काशी का वह पूरा घाट स्वर्ण ...

कर्मफल B71

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गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कर्म करो फल की चिंता मत करो , इस वाक्य को प्राथमिक विद्यालय उजरियोँव लखनऊ की प्रधानाद्यापिका श्रीमती सरिता शर्मा ने कर दिखाया है। स्कूल को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाने के लिए दिन-रात एक करके सीमित संसाधन होते हुए भी श्रीमती सरिता शर्मा ने बच्चों की शिक्षा के लिये अधक प्रयास करके आज विद्यालय को प्राइवेट विद्यालयों के प्लेटफॉर्म पर ला कर खड़ा कर दिया है । मैं ईश्वर से ,भगवान रामकृष्ण परमहंस देव से इनके मंगलमय जीवन की प्रार्थना करता हूँ, " जीवन का एक उद्देश्य हो तो कठिन मार्ग भी सरल हो जाते हैं " 💐।।जय श्री कृष्ण।।💐

कर्मफल B70

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 कर्मफल भोगना ही पड़ता है ! इसी जन्म में , शेष रहा तो अगले जन्म में भी !  हम कर्म के प्रति सचेष्ट रहें ! ईश्वर से डरो मृत्यु का स्मरण करो गलती नहीं होगी ।               जय श्री गुरुदेव अघोरेश्वर भगवान अवधूत राम                              🙏🌺🌹🌺🙏

मशान नाथ भैरव देवा B69

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                           🙏🌹🌹🌹🌹🌹🙏 सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र घाट बाबा मशान नाथ भैरव देवा अधिपति काशी विश्वनाथ जी शुभ रविवार अघोरान्ना परो मंत्रो नास्ति त्वंम गुरो परम् बाबा किनाराम जी परो मंत्रो नास्ति त्वंम गुरो परम् बाबा कालूराम जी परो मंत्रो नास्ति त्वंम गुरो परम् बाबा अवधुत राम भगवान जी परो मंत्रो नास्ति त्वंम गुरो परम् बाबा सिद्धार्थ गौतम राम जी परो मंत्रो नास्ति त्वंम गुरो परम् बाबा मशान नाथ जी परो मंत्रो नास्ति त्वंम गुरो परम् बाबा महाकाल जी परो मंत्रो नास्ति त्वंम गुरो परम् बाबा महामृत्युंजय जी परो मंत्रो नास्ति त्वंम गुरो परम् बाबा काशी काल भैरव जी परो मंत्रो नास्ति त्वंम गुरो परम् बाबा दंडपानी भैरव जी परो मंत्रो नास्ति त्वंम गुरो परम् बाबा कपाल भैरव जी परो मंत्रो नास्ति त्वंम गुरो परम् बाबा ऊं बम बम बम बटुक भैरव जी परो मंत्रो नास्ति त्वंम गुरो परम् मां सर्वेश्वरी त्वंम पाहिमाम् शरणना गतम मां चंड मां शव शिवा काली मां भवानी जी त्वमं पाहिमाम् शरणना गतम मां चंड मां श्मशान काली मां भवानी जी त्वमं पाहिमाम् श...

श्री बाबा कीनाराम B68

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            🌹अघोराचार्य बाबा कीना राम जी महाराज🌹 अघोराचार्य बाबा कीनाराम (जन्म:१६९३-१७६९, काशी) अघोर सम्प्रदाय के अनन्य आचार्य थे। इनका जन्म सन् १६९३ भाद्रपद शुक्ल को चंदौली के रामगढ़ गाँव में अकबर सिंह के घर हुआ।  बारह वर्ष की अवस्था में विवाह अवश्य हुआ पर वैराग्य हो जाने के कारण गौना नहीं कराया। ये देश के विभिन्न भागों का भ्रमण करते हुए गिरनार पर्वत पर बस गये। कीनाराम सिद्ध महात्मा थे और इनके जीवन की अनेक चमत्कारी घटनाएं प्रसिद्ध हैं। सन् १७६९ को काशी में ही इनका निधन हुआ। जीवन परिचय संपादित है :- बाबा किनाराम उत्तर भारतीय संत परंपरा के एक प्रसिद्ध संत थे, जिनकी यश-सुरभि परवर्ती काल में संपूर्ण भारत में फैल गई। वाराणसी के पास चंदौली जिले के ग्राम रामगढ़ में एक कुलीन रघुवंशी क्षत्रिय परिवार में सन् 1601 ई. में इनका जन्म हुआ था। बचपन से ही इनमें आध्यात्मिक संस्कार अत्यंत प्रबल थे। तत्कालीन रीति के अनुसार बारह वर्षों के अल्प आयु में, इनकी घोर अनिच्छा रहते हुए भी, विवाह कर दिया गया किंतु दो तीन वर्षों बाद द्विरागमन की पूर्व संध्या को इन्होंने हठपूर्वक ...

अवधूत वाणी B67

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 पशु तो शायद नाम से ही पशु है, मगर काम से तो मनुष्य ही पशु है । पशुओं के कृत्य मनुष्यों से अच्छे हैं, दूसरों के प्रति वह चिन्तित न होकर वह शान्त है, सुख से है, चैन से है । - - - - समय रूपी सुन्दरी आपकी प्रतीक्षा में है । यदि समय रूपी सुन्दरी को सुनिश्चित तरीके से नहीं भोगेंगे तो वह आपको खा जाएगी । उसकी अपेक्षा का परिणाम घातक होगा । - - - अवधूत भगवान राम जी. ..अवधूत वाणी ( पृ क्र 33 )                       🙏🌹🌹🌹🌹🌹🙏

अवधूत भगवान राम B66

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 यह हाड़ माँस का देह गुरु नहीं है। गुरु वह पीठ है जिसके द्वारा व्यक्त किया हुआ विचार तुममे परिपक्वता का पूरक होगा। यदि तुम उसे पालन करते रहोगे, गुरुत्व को जानने मे सब प्रकार से समर्थ होओगे गुरू तुम्हारे विचार की परिपक्वता , निष्ठा की परिपक्वता , विश्वास की परिपक्वता है !  अवधूत की परिभाषा : अ = अविनाशी व = सर्वोत्तम  धू = विधि-निषेध से परे त = सत्-चित्- आनन्द घृणा और विष के शमनकारक को अघोर कहते हैं ।  🌺परमपूज्य अघोरेश्वर महाप्रभु द्वारा -अघोर साधना के दुरूह पथ का वरण🌺 घोर तपस्या व निश्छल त्याग तथा पीडित मानवता की सेवा ने ही बालक भगवान को बनाया  🕉️ परमपूज्य अघोरेश्वर महाप्रभु भगवान राम ।🕉️ पूर्व के राज्य वंश से संबंधित भोजपुर,आरा बिहार के सामान्य किसान परिवार में सन 1937 में जन्मे बालक के अलौकिक क्रिया कलापों को देख माता पिता व परिवार वालों ने बालक का नाम भगवान रखा । 🌼बाल्य अवस्था मे ही लोगों को बालक मे अलौकिक प्रतिभाओं का दर्शन होने लगा था कि तभी मात्र सात वर्ष की अल्प आयु मे ही बालक भगवान संसारिकता से विरक्त हो  गये । और घर बार त्याग गंगा तथा सोन के तट...

श्री श्री माँ सारदा B65

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                  ।।🌹 श्री श्री रामकृष्ण:शरणम् 🌹 ।। ।।🌹 श्री श्री माँ सारदा देवी की १६८वीं जन्मतिथि ५   जनवरी २०२१🌹पर हार्दिक शुभकामनाएं🙏🌹🌻🌼🌻🌹🙏।।  माँ की बातें - ( सूक्तियाँ ) - * ईश्वर तो बिलकुल अपने हैं । यह सम्बन्ध चिरन्तन है । जो उनको जितनी आन्तरिकता से चाहता है , वह उन्हें उतना ही अधिक प्राप्त करता है । भय मत करो । हमेशा याद रखो कि कोई तुम्हारी रक्षा कर रहा है । * जब मन में किसी बात को जानने की इच्छा उठे तो एकान्त स्थान में जाकर आँखों में अश्रु भरकर उनसे प्रार्थना करो । वे तुम्हारे मन की सारी गन्दगी और समस्त दुःख को हटा देंगे और तुम्हें सब कुछ समझा देंगे । * जैसे हवा बादलों को हटा देती है , वैसे ही भगवान का नाम सांसारिकता के बादलों को नष्ट कर देता है । जय श्री श्री माँ सारदा देवी जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏🌻🌹🌻🙏  

कल्पतरु दिवस B64

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१जनवरी१८८६ ई. के दिन दक्षिणेश्वर माँ काली मन्दिर में भगवान श्रीरामकृष्ण देव ने अपने अनेक गृही भक्तों को विभिन्न आध्यात्मिक अनुभूतियाँ प्रदान की थीं । तभी से प्रतिवर्ष यह दिन " कल्पतरु दिवस " के रूप में मनाया जाता है । जयश्री भगवान रामकृष्णपरमहंस देव  , माँ , स्वामी जी साष्टांग प्रणाम भक्ति दो प्रभु दया करो प्रभु  🙏🌼🌺🌼🙏

ईश्वर प्राप्ति B63

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    गुरु ने कहा,"मेरे बच्चे, यदि तुम भगवत्प्राप्ति की इच्छा रखते हो, तो अवश्य ही तुम्हें भगवान का लाभ होगा ।"शिष्य ने गुरु का मन्तव्य पूर्णतया नहीं समझा। एक दिन दोनों नहाने के लिए एक नदी में गये । गुरु ने शिष्य से कहा , "डुबकी लगाओ"और शिष्य ने डुबकी लगायी। एकदम गुरु ने शिष्य के सिर को पकड़ लिया और उसे पानी में डुबाये रखा । उन्होंने शिष्य को ऊपर नहीं आने दिया । जब वह लड़का ऊपर आने की कोशिश करते-करते थक गया, तब गुरु ने उसे छोड़ दिया और पूछा, "अच्छा, मेरे बच्चे, बताओ तो सही तुम्हें पानी के अन्दर कैसा लग रहा था ? " "ओफ़! एक साँस लेने के लिए मेरा जी निकल रहा था।" "क्या ईश्वर के लिए भी तुम्हारी इच्छा उतनी ही प्रबल है ? " "नहीं गुरु जी ।" गुरु जी ने कहा "तब ईश्वर प्राप्ति के लिए वैसी ही उत्कट इच्छा रखो , तुम्हें ईश्वर के दर्शन होंगे।"   जयश्रीभगवान रामकृष्ण परमहंस देव ,  जयश्री माँ सारदा देवी मन की शक्तियां तथा जीवन- गठन की साधनाएँ  🙏🌼🌺🙏जयश्रीस्वामी विवेकानंद देव 🙏🌺🌼🙏

SACCHA MITRA B62

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  सच्चा मित्र- ( एक कड़वी सच्चाई ) :- वर्तमान में मित्र की परिभाषा क्या है ? क्या आप सभी ने कभी सोचा है सच्चा मित्र कौन है ? आप कहेंगे कि मित्र - साथ में पढ़ने वाला है , साथ में खेलने वाला है , शोशल मीडिया पर रहने वाला , मेरा मित्र है । कार्यालय में साथ में काम करने वाला मेरा मित्र है , कहीं किसी नए नगर में गये वहाँ पर किसी ने सहायता कर दी वह मेरा मित्र बन गया । किसी ने कुछ भेंट कर दिया वह मित्र बन गया । ये जो मित्र शब्द है इसे हम बड़े आसानी से परिभाषित कर देते हैं । ये मित्र नही होते हैं ये समय समय पर मतलब, परिस्थिति ,वर्तमान समय की मांग कह लें, कभी कभार आपके लिए किसी परिस्थिति पर खड़े हो जाएं बस आपके काम आ जाएं तो हम समझ लेते हैं की क्या मित्र है । ऐसा व्यक्ति मित्र नही बस एक जान पहचान वाला व्यक्ति कहलाता है और कुछ नहीं ।यह एक कड़वी सच्चाई है परन्तु इनमें से कई लोग मेरी बातों से सहमत न हो किन्तु कहानी के अंत तक आते आते  मन के किसी कोने में मेरी बातों से सहमत तो होंगे लेकिन इसे प्रकट नहीं करेंगे । सबसे पहले साथ में पढ़ने वाला मित्र। वह मन ही मन आप से प्रतिस्पर्धा रखता है आप से ज्या...

महाजनपद युग भाग-१७ B61

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  शूरसेन महाजनपद :-  शूरसेन / सूरसेन / शौर सेनाई / शौरि महाजनपद के नाम से जाना जाता था । शूरसेन महाजनपद उत्तरी भारत का प्रसिद्ध जनपद था । जिसकी राजधानी मथुरा में थी , पहले इसे मधुरापुरी के नाम से जाना जाता था । राजा शत्रुघ्न के पुत्र " शूरसेन " के नाम पर शूरसेन महाजनपद का नाम रखा था । बाद में चंद्रवंशी यादवों ने यहाँ राज किया तब इसका नाम मथुरा रखा गया ।            इतिहासकारों का मत है कि लगभग एक सहस्त्र ईस्वी पूर्व से पांच सौ ईस्वी तक के युग को भारतीय इतिहास में जनपद व महाजनपद युग कहा जाता है । शूरसेन ने पुरानी मथुरा के स्थान पर नई नगरी बसाई थी । ।। जय श्री कृष्ण ।।     - प्रशान्त जे के शर्मा @ Copyright

महाजनपद युग भाग-१६ B60

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  कुंतल महाजनपद :-  द्वापर युग में महाभारत काल के समय इस नाम के तीन प्रदेशों का उल्लेख है -  १-मध्यदेश में काशी-कोसल के निकटवर्ती क्षेत्र । २- दक्षिण में कृष्णानदी के निकट का क्षेत्र ( अनेक पुराणों में कर्नाटक)को कुंतल देश कहा गया है । ३- कोंकण के निकट का क्षेत्र - ११वीं - १२वीं शती के अनेक अभिलेखों के अनुसार कुंतल देश का उल्लेख हुआ है , भीमा , वेदवती नदी का किनारा , शिमोगा , चीतलदुर्ग , बेलारी , धारवाड़ , बीजापुर के जिले रहे होंगे , कुछ लोगों का मानना है , कोंकण प्रदेश के पूर्व कोल्हापुर के उत्तर , हैदराबाद के पश्चिम कृष्णा मालपूर्वी और वर्धा नदी का किनारा माना जाता है । ।। जय श्री कृष्ण ।।।     - प्रशान्त जे के शर्मा @Copyright

महाजनपद युग भाग-१५ B59

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  वत्स महाजनपद :- वर्तमान का उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद जो कि वर्तमान में प्रयागराज हो गया है ।तथा मिर्जापुर जिला इसके अंतर्गत आते थे , इस जनपद की राजधानी कौशाम्बी(जिला- प्रयागराज उ.प्र.) थी ।ऐतरेय ब्राम्हण में जिन वंश के लोगों का उल्लेख है वे इसी देश के निवासी थे । कौशाम्बी में जनपद की राजधानी प्रथम बार पांडवों के वंशज 'निचक्षु' ने बनायी थी ।  वत्स देश का उल्लेख वाल्मीकि रामायण में भी मिलता है । रामायण काल में गंगा नदी वत्स व कोसल जनपदों की सीमा पर बहती थी । महाभारत के अनुसार भीमसेन ने वत्सभूमि पर विजय प्राप्त की थी । ।। जय श्री कृष्ण ।।     - प्रशान्त जे के शर्मा @Copyright 

महाजनपद युग भाग-१४ B58

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  मल्ल महाजनपद :-  पूर्वी उत्तर प्रदेश का क्षेत्र , मल्ल महाजनपद में आता था , इसकी राजधानी कुशीनगर थी । वाल्मीकि रामायण में मल्लदेश का सर्वप्रथम उल्लेख मिलता है। भगवान रामचंद्र जी ने लक्ष्मण-पुत्र चन्द्रकेतु के लिए मल्लदेश का निर्माण कराया था ।बौद्ध साहित्य में मल्लदेश की दो राजधानीयों का वर्णन क्रमशः है - १- कुशावती व २- पावा ।। जय श्री कृष्ण ।।  @Copyright  प्रशान्त जे के शर्मा ।

महाजनपद युग भाग- १३ B57

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  मत्स्य या मच्छ महाजनपद:-  वर्तमान में अलवर , भरतपुर , जयपुर ज़िले के क्षेत्र सम्मलित थे ।महाभारत काल का एक प्रसिद्ध जनपद था । इस देश में विराट का राज था यहां की राजधानी उपपल्लव नामक नगर में थी ।विराटनगर मत्स्य देश का दूसरा सबसे प्रमुख नगर था ।भीम व सहदेव ने भी मत्स्यों , मत्स्य देश पर विजय प्राप्त की थी ।                     अलवर के एक भाग में शाल्व देश था , जो मत्स्य का पार्श्ववर्ती जनपद था । पांडवों ने मत्स्य देश में विराट के यहाँ पर रहकर अपने अज्ञातवास का एक वर्ष बिताया था । @Copyright    ।। जय श्री कृष्ण ।।       - प्रशान्त जे के शर्मा

महाजनपद युग भाग-१२ B56

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  मगध महाजनपद :- बौद्ध काल एवं परवर्तीकाल में उत्तर भारत का सबसे शक्तिशाली जनपद था। इसका क्षेत्र दक्षिण बिहार का क्षेत्र था जो वर्तमान में पटना , गया जिला इनमें सम्मलित थे । महाभारत के समय इसकी राजधानी "गिरिव्रज" थी । महाभारत के समय यहां का राजा जरासंघ था ।    मगध साम्राज्य की सीमा उत्तर गंगा से दक्षिण विन्ध्यपर्वत तक था , पूर्व में चम्पा से पश्चिम में सोननदी तक विस्तृत थी ।मगध साम्राज्य के "विश्व स्फटिक" नामक राजा ने आर्यसभ्यता का प्रचार किया था । मगध की प्राचीन राजधानी राजगृह थी , यह पांच पहाड़ियों से घिरा नगर था । कालान्तर में मगध साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र में स्थापित हुई बाद में मगध ने कौशल , वत्स , अवंति , को अपने महाजनपद में मिला लिया । इस प्रकार प्राचीन मगध का इतिहास ही भारत का इतिहास बना ।   ।। जय श्री कृष्ण ।। @Copyright  प्रशान्त जे के शर्मा 

महाजनपद युग भाग-११ B55

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  वृज्जि या वज्जि (महाजनपद) - वृज्जि उत्तर बिहार का बौद्ध वज्जि , वृज्जि का ही रूपांतरण है ।बुद्ध के जीवन काल में मगध सम्राट अजातशत्रु और वृज्जि गणराज्य में बहुत दिनों तक संघर्ष चलता रहा । ।। जय श्री कृष्ण ।।  - प्रशान्त जे के शर्मा @Copyright

महाजनपद युग भाग-१० B54

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पंचाल (महाजनपद) - पंचाल वर्तमान में पश्चिम उत्तर प्रदेश का बरेली , बदायूँ , फर्रुखाबाद , रुहेलखंड  जिलों से परिवृत प्रदेश का प्राचीन नाम है ।  यह कानपुर से वाराणसी के बीच गंगा नदी के गंगा के मैदान में फैला हुआ था ।  इसकी दो राजधानी थीं ।  १- उत्तर पांचाल - उत्तर पांचाल की राजधानी अहिच्छत्र थी । २- दक्षिण पांचाल - दक्षिण पांचाल की राजधानी कांपिल्य थी ।         कनिंघम के अनुसार वर्तमान में रुहेलखंड उत्तर पांचाल और दोआबा दक्षिण पांचाल था। पांचाल वर्तमान रुहेलखंड का प्राचीन नाम था । मान्यता है कि इसका यह नाम राजा हर्यश्व के पांच पुत्रों के कारण पड़ा था । श्री राय चौधरी का मत है कि पांचाल पांच प्राचीन कुलों का सामूहिक नाम था -  १ किवी २ केशी ३ सृंजय ४ तुर्वसस ५ सोमक । द्रोणाचार्य ने अर्जुन की सहायता से पंचालराज द्रुपद को हराकर उनके  उत्तर पांचाल को ले लिया था। ।। जय श्री कृष्ण ।।       -  प्रशान्त जे के शर्मा @Copyright

महाजनपद युग भाग-९ B53

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  गांधार (महाजनपद) - गांधार महाजनपद वर्तमान में पाकिस्तान का पश्चिमी भाग एवं अफगानिस्तान का पूर्वी क्षेत्र है । प्रमुख नगर - पुरुष पुर (आधुनिक पेशावर नगर) एवं तक्षशिला इसकी राजधानी थी । इसका अस्तित्व६०० ईसा पूर्व से ११वीं सदी तक रहा । कुषाण शासन के समय यहां बुद्ध धर्म बहुत फला फूला पर बाद में  मुस्लिम आक्रमण के कारण इसका पतन हो गया । १२५३ ईस्वी में चीन के सम्राट कुबलाखां ने गांधार को जीतकर यहां के हिन्दु राज्य की समाप्ति कर दी ।         इस प्रदेश का वर्णन महाभारत और सम्राट अशोक के शिलालेखों में मिलता है । महाभारत के अनुसार धृतराष्ट्र की रानी और युवराज दुर्योधन की माँ गांधारी , गंधार की राजकुमारी थीं । यह पाकिस्तान के रावलपिंडी और पेशावर जिलों में आता है । तक्षशिला एवं पुष्कलावती यहीं के प्रसिद्ध नगर थे ।          "कैकय" देश इसके पूर्व में स्थित था , कैकय-नरेश युधाजित के कहने से अयोध्यापति भगवान रामचंद्र जी के भाई भरत ने गंधर्व देश को जीता था और तक्षशिला एवं पुष्कलावती नगर को बसाया था । चंद्रगुप्त मौर्य साम्राज्य में सम्पूर्ण गांधार ...

महाजनपद युग भाग-८ B52

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चेदि या चेति (महाजनपद) - चेदि या चेति महाजनपद वर्तमान में बुंदेलखंड का दक्षिणी भाग व जबलपुर का उत्तरीभाग सम्मलित था । महाभारत काल में शिशुपाल यहां का प्रसिद्ध राजा था । वर्तमान में ग्वालियर क्षेत्र में वर्तमान चंदेरी कस्बा ही प्राचीन काल के चेदि राज्य की राजधानी बतलाया गया है ।  ।। जय श्री कृष्ण ।।           -  प्रशान्त जे के शर्मा  @Copyright

महाजनपद युग भाग-७ B51

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  कुरु (महाजनपद) - वर्तमान में हरियाणा , दिल्ली का यमुना नदी के पश्चिम वाला अंश सम्मलित था । इसकी राजधानी हस्तिनापुर एवं इन्द्रप्रस्थ थी । ( इन्द्रप्रस्थ - वर्तमान दिल्ली ) व हस्तिनापुर जो कि उत्तर प्रदेश राज्य के मेरठ ज़िले में स्थित एक नगर है । पुराण में राजा कुरु के नाम पर इसका नाम कुरु महाजनपद पड़ा । महाभारत के पश्चात कुरुवंश का अंतिम राजा निचक्षु थे , राजा परिक्षित के वंशज ( युधिष्ठिर से ७ वीं पीढ़ी में ) थे । हस्तिनापुर के गंगा द्वारा बहा दिए जाने पर अपनी राजधानी वत्स  देश के कौशाम्बी नगरी को बनाया । तथ्य :- १- हिमालय के उत्तर का भाग 'उत्तर कुरु ' और हिमालय के दक्षिण का भाग  'दक्षिण कुरु ' के नाम से जाना जाता था । २- प्रसिद्ध चंद्रवंशी राजा कुरु के पिता का नाम " संवरण " व माता का नाम " तप्ती "  था ।      राजा कुरु की दो पत्नियां थीं -  " सुभांगी " व " वाहिनी " । वाहिनी के पांच पुत्र हुये । जिनके कनिष्ठ का नाम जनमेजय था- जिनके वंशज धृतराष्ट्र व पांडु हुए । ।। जय श्री कृष्ण ।।          - प्रशान्त जे के शर्मा .  @Copy...

महाजनपद युग भाग-६ B50

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  कौशल (महाजनपद)  -   उत्तर भारत का प्रसिद्ध जनपद राजधानी 'अयोध्या' थी । कौशल महाजनपद में फैज़ाबाद(वर्तमान में- अयोध्या) , गोंडा , बहराइच के क्षेत्र सम्मलित थे । यह जनपद सरयू नदी ( गंगा नदी की सहायक नदी ) के तटवर्ती प्रदेश में स्थित था । चित्रकूट तक सीमा थी । कौशल महाजनपद का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है ।  🌹अयोध्या भगवान श्री राम की जन्मभूमि भी है ।🌹 ।। जय श्रीराम जय श्रीकृष्ण ।।    - प्रशान्त जे के शर्मा @Copyright

महाजनपद युग भाग-५ B49

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काशी (महाजनपद) -  काशी का दूसरा वर्तमान नाम वाराणसी है । हरिवंश पुराण में उल्लेख आया है , काशी को बसाने वाले 'पुरूखा' के वंशज राजा ' काश ' थे । अतः उनके वंशज काशी कहलाये ।      एक उल्लेख और है -  पार्वती माता के मुक्तामय कुंडल गिर जाने से इस क्षेत्र को मुक्त क्षेत्र की संज्ञा दी गई एवं इसकी अकथनीय परमज्योति के कारण तीर्थ का नामकरण काशी किया गया । ।। जय श्री कृष्ण ।।   - प्रशान्त जे के शर्मा @Copyright

महाजनपद युग भाग-४ B48

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कंबोज (महाजनपद) -  कंबोज देश का विस्तार कश्मीर से हिंदुकुश तक था । (वर्तमान हिंदुकुश-पाकिस्तान , अफगानिस्तान ) है । कौटिल्य अर्थशास्त्र में कंबोज को चंद्रगुप्त मौर्य के गणराज्य , साम्राज्य में विलीन रहा होगा ऐसा बतलाया गया है ।            हिंदुकुश उत्तरी पाकिस्तान के विवादित भाग से मध्य अफगानिस्तान तक विस्तृत एक ८०० कि. मी. चलने वाली पर्वत श्रृंखला है । इसका सबसे ऊंचा पहाड़ पाकिस्तान के खैबर - पख्तूनख्वा प्रान्त के चित्राल ज़िले में स्थित ७७०८ मीटर  ( २५२८९ ) फ़ुट लम्बा तिरिच मीर पर्वत है ।हिंदुकुश पामीर पर्वतों से जाकर जुड़ते हैं और हिमालय की एक उपशाखा माने जाते हैं।  ।। जय श्री कृष्ण ।।         - प्रशान्त जे के शर्मा @Copyright

महाजनपद युग भाग-३ B47

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  अश्मक (महाजनपद) -  अश्मक महाजनपद नर्मदा नदी , गोदावरी नदी , के बीच इसकी राजधानी 'पाटन' थी। वर्तमान में महाराष्ट्र कहते है , इसका उल्लेख बौद्ध साहित्य में मिलता है । वहीं कूर्म पुराण , बृहतसंहिता में अश्मक को उत्तर भारत का अंग माना गया है । इसके अनुसार पंजाब के समीप का क्षेत्र आता है परन्तु        राजशेखर जी ने अपनी काव्य-मीमांसा में इसकी स्थिति दक्षिण भारत में माना गया है । जिसमें महाराष्ट्र , विदर्भ , कुंतल , कांची , केरल , क्रथेशिक , सुर्पारक , चोल , पांडय , कोंकण , आदि जनपदों का समावेश बतलाया गया है ।  ।। जय श्री कृष्ण ।।        - प्रशान्त जे के शर्मा  @Copyright

महाजनपद युग भाग-२ B46

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अवंती (महाजनपद) - ६१५-६३०ई. में कहा जाता है शंकराचार्य के समकालीन अवंती-नरेश सुधन्वा ने जैनधर्म का उत्कर्ष सूचित करने के लिए प्राचीन अवंतिका का नाम उज्जयिनी कर दिया था , यह केवल कपोल कल्पना मात्र है , मध्यकाल में इस नगरी को मुख्यतः उज्जैन ही कहा जाता था । १७५०-१८१०ई. तक सिंधिया नरेशों का शासन स्थापित था और उज्जैन इनकी राजधानी थी बाद में ग्वालियर को राजधानी बनाया गया ।              आधुनिक मालवा का प्रदेश जिसकी राजधानी उज्जयिनी और महिष्मति थीं । उज्जैन मध्यप्रदेश का एक प्रमुख नगर है , प्राचीन संस्कृत में एवं पाली साहित्य में अवंति , उज्जयिनी का सैकड़ों बार उल्लेख है । पुराणों के अनुसार अवंति की स्थापना यदुवंशी क्षत्रियों द्वारा की गई थी ।महाभारत काल में सहदेव द्वारा अवंति पर विजय का उल्लेख है ।             उज्जैन में ही भगवान श्री कृष्ण की शिक्षा भी हुई थी ।               ।। जय श्री कृष्ण ।।  - प्रशान्त जे के शर्मा . @Copyright               ...