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Showing posts from September, 2025

Title शीर्षक, नाम, उपाधि, पदवी, B230

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उपाधि:- * रावल*, उस समय मेवाड़ के शासकों को 'रावल' की उपाधि दी जाती थी। हंमीर के समय से बहां के शासकों ने 'राणा' उपाधि अंगीकार की, जो व्यवहारतः चलती रही, प्रताप भी राणा प्रताप ही थे, परंतु कुछ अभ्यास में, कुछ आदर में, 'राणा' 'महाराणा' कहे जाने लगे। हंमीर ने मेवाड़ का भाग्य - बदला था, उसी के समय से वहां के शासकों की उपाधि बदली, जो अपने वृहदाकार 'महाराणा' के रूप में भारत के स्वतंत्र होने पर मेवाड़ के भारत में विलय तक चलती रही, और अब भी श्रद्धा की परंपरा जो मेवाड़ ने अपने लिए निर्मित की उसी के कारण मेवाड़ के शासक 'महाराणा' उपाधि के साथ ही स्मरण एवं सम्मान प्राप्त किए हुए हैं देश में किसी अन्य राजवंश को यह उपाधि प्राप्त नहीं थी, न अब किसी अन्य के लिए इसका उपयोग होता है।

Shri Neeb karori maharaj Part-2 B229

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उत्तराखण्ड में हनुमान मंदिरों की स्थापना:- नीब करौरी बाबा द्वारा सम्पन्न  उत्तराखण्ड-वासियों की अपने प्रति निष्ठा, सहज-प्रेम और अफ्नत्व के प्रतिदान स्वरूप महाराज जी ने भी उनके प्रति अपने अमर प्रेम की प्रतिमूर्तियाँ श्री बजरंगगढ़ हनुमान मंदिर (नैनीताल)तथा श्री कैंची हनुमान मंदिर(निकट भीम ताल) एवं आश्रम उन्हें प्रदान कर दिये, जिनका सूक्ष्म में वर्णन प्रस्तुत है बजरंगगढ़:- बजरंगगढ़ उत्तराखण्ड में बाबा जी द्वारा स्थापित प्रथम हनुमान-मंदिर है। नैनीताल से डेढ़ कि०मी० दूर स्थित नैनीताल हल्द्वानी मोटर मार्ग में घाटी नामक स्थान में बजरी के एक ऊँचे पहाड़ी टीले को बाबा जी ने इस मंदिर की स्थापना  की ।चबूतरे के ऊपर (गुफा का कुछ भाग लिये) हनुमान जी का मंदिर बन गया जिससे सटकर श्री लक्ष्मी-नारायण मंदिर, शिव मंदिर और कीर्तन भवन (जिसके एक भाग में बाद में बाबा जी ने श्री वैष्णवी दैवी के मंदिर की स्थापना की व्यवस्था कर दी थी) देखते-देखते खड़े हो गये। साथ में कुछ आवासीय कुटियों भी बन गई। बीहड़ जंगल एवं बड़ी-बड़ी चट्टानें हटाकर भूमि को समतल कर, दक्षिण की ओर कुछ ऊँचाई में अद्वैत आश्रम भी बन गया। विभ...