बाबा किनाराम भाग-३ B74


               🌹:अघोर साधक बाबा कीनाराम:🌹
                               

                                   भाग --03

 बाबा कीनाराम शिवाला स्थित क्रीमकुण्ड स्थल में साधना में प्रायः लीन रहा करते थे। क्रीमकुण्ड का द्वार और राजा चेत सिंह के किले का मुख्य द्वार करीब 400 मीटर की दूरी पर था। राजा बलवन्त सिंह की मृत्यु 1770 में हो जाने के बाद बाबा बहुत दुःखी हुए थे क्योंकि वह बाबा के परम भक्तों में से थे। उसके बाद बाबा को राज-परिवार से कोई विशेष् रूचि नहीं रह गयी थी। राजा चेतसिंह राजा बलवन्त सिंह के नजदीकी रिश्तेदार थे। रानी पन्ना कुंवर के पुत्र गद्दी पर बैठे, वैसे राजा चेतसिंह गद्दी पर बैठना चाहते थे। लेकिन जब ऐसा नहीं हो पाया तो राजा चेतसिंह ने शिवाला स्थित किले को अपना निवास स्थान बना लिया। आज भी वह किला राजा चेतसिंह के नाम से प्रसिद्ध है।

      बाबा कीनाराम एक महान् सन्त थे। दया-करुणा के कार्यों में हमेशा निमग्न रहते थे। उन्होंने अपने जीवन में न जाने कितनों का कल्याण किया। लेकिन श्राप की कथा केवल राजा चेतसिंह के साथ मिलती है।

      अक्सर राजा बलवन्त सिंह अपने शिवाला स्थित महल में आया करते थे (जो बाद में राजा चेतसिंह का निवास स्थल बना)। सामने बाबा कीनाराम का स्थल  आमने-सामने होने से राजा और साधक की भेंट होती। बाबा कीनाराम जब भी महल में आते तो उनके लिए विशेष् व्यवस्था होती थी। घंटों प्रवचन चलता। कभी-कभी विशेष् पर्वों पर नर्तकियों की कला का प्रदर्शन भी होता। उन्हें राजा से इनाम और बाबा से आशीर्वाद प्राप्त होता। यह सिलसिला सालों चलता रहा। राजा बलवन्त सिंह के नजदीकी रिश्तेदार होने के नाते कभी-कभी राजा चेतसिंह भी उपस्थित हो जाते। लेकिन वे बाबा से न बात करते और न ही आशीर्वाद लेते क्योंकि उन्हें अघोरी बाबा और उनके शिष्यों से घृणा थी। वे प्रायः यही चाहते थे कि बाबा का महल में आना-जाना बन्द हो जाये, पर राजा बलवन्त सिंह की बाबा के प्रति श्रद्धा-भक्ति के कारण ऐसा सम्भव न हो सका।

      लेकिन ऐसा एक दुर्योग आ ही गया। राजा बलवन्त सिंह की मृत्यु के बाद राजा चेतसिंह ने किले के मुख्य द्वार पर सदा के लिए ताला डलवा दिया और उत्तर की ओर उसका एक नया द्वार बनवा लिया। बाबा ने देखा कि किले के मुख्य द्वार में ताला पड़ा है फिर भी उन्होंने कुछ कहा नहीं। समय अपनी गति से चलता रहा। 

      एक दिन राजा चेतसिंह ने ब्राह्मणों के कहने से महल के भीतर शिव मन्दिर बनवाया। शिव-मूर्ति की स्थापना के लिए शुभ दिन और मुहूर्त निकला। उस दिन काशी के सभी गण्यमान विद्वान् और साधू-सन्तों को निमन्त्रण पत्र भेजा गया। लेकिन बाबा कीनाराम को जानबूझकर छोड़ दिया गया। सभी लोग यथास्थान बैठ गए तो पूजन आरम्भ हुआ। मगर उपस्थित लोगों को आश्चर्य हुआ कि काशी के साक्षात् शिव कहे जाने वाले महान् सन्त बाबा कीनाराम इस अवसर पर उपस्थित नहीं हैं। बाद में लोगों को जब पता चला कि बाबा को जानबूझकर छोड़ा गया है तो लोग बहुत दुःखी हुए। कुछ लोग तो जो बाबा के अनन्य भक्त थे, उठकर जाना चाहते थे। लेकिन यह राज-अपमान होता --यह मानकर लोग बैठे रहे।

      तभी मुख्य द्वार का ताला एकाएक एक झटके से टूट गया। द्वारपाल जब दौड़कर वहां पहुंचा तो उसने देखा कि बाबा कीनाराम द्वार पर खड़े हैं। चारोँ ओर हल्ला हो गया--बाबा आ गए, बाबा आ गए। भक्तों में ख़ुशी की लहर दौड़ गयी। सभी लोग बाहर आ गए और देखा कि बाबा सर्वांग चिता भस्म लगाये साक्षात् भैरव रूप में लाल ऑंखें किये खड़े हैं--गले में रुद्राक्ष की माला, हाथ में मानव-हड्डी लिए। उस समय पूजा समाप्त हो रही थी। सभी लोगों के आग्रह करने पर बाबा कीनाराम पूजा स्थल पर जा पहुंचे। जैसे ही राजा चेतसिंह की नज़र बाबा पर पड़ी, वे क्रोध में अपना मानसिक सन्तुलन खोते हुए खड़े हो गए और सैनिकों को आवाज़ दी। चिल्लाते हुए बोले--इस मशान अघोरी को किसने भीतर आने दिया, उठाकर इसे बाहर फेंक दो। पूरी पूजा अशुद्ध हो गयी। लेकिन किसकी हिम्मत थी कि बाबा को कोई स्पर्श भी कर सके। थोड़ी देर बाबा अपलक देखते रहे फिर बोले--जिस महादेव की तुम पूजा कर् रहे हो, हम सब उसी के अंश हैं, उसी में समा रहे हैं और उसी से प्रकट हो रहे हैं। लय-विलय के वही कारक हैं। उनका निवास ही महाश्मशान है। शंकर का प्रथम रूप ही अघोर है, अवधूत है। इस पूजा से तुम्हें क्या फल मिलेगा, जब तुम उनके ही अंश का अपमान कर् रहे हो ? मैं फिर कहता हूँ राजन ! अपने ऊपर नियंत्रण करो नहीं तो घोर अनर्थ हो जायेगा।

       नियति को कौन टाल सका है ? जो होना था, वह होकर ही रहता है। राजा चेतसिंह तलवार निकालने जा रहे थे, लेकिन लोगों ने ऐसा करने से उन्हें रोक दिया।

       अब बस तेरे सर्वनाश का समय आ गया है। तू जो घमंड में चूर है, सारी मर्यादाओं को लाँघ चुका है, तो सुन चेतसिंह !--बाबा अपना दाहिना हाथ उठाते हुए श्राप देते हुए बोले--तू अपने घमण्ड में अपनी दृष्टि खो बैठा है, मुझे अपमानित कर यहाँ से निकालने की आज्ञा दे रहा है। आज के बाद तेरे वंश में तेरी आज्ञा मानने वाला न रहेगा, तू कभी अपने वंश का मुंह भी नहीं देख सकेगा। तेरे चाटुकार जो तेरे पास खड़े हैं, वे भी निस्संतान रहेंगे !

      इतना कह कर बाबा तेज कदमों से महल से बाहर निकल आये। पुनः पलटकर किले और मन्दिर पर दृष्टिपात किया और बोले--यह किला तेरे हाथ से निकल कर् विद्यार्थियों के हाथ में चला जायेगा। जब तक यह किला रहेगा, इस पर कबूतरोँ और चमगादडों का बसेरा रहेगा।

      एक पल में सब कुछ बदल गया। चारों तरफ सन्नाटा छा गया। पूरा वातावरण सन्न रह गया। लोगों को पता था कि बाबा का कहा गया कभी भी असत्य नहीं होता। एक दिन बाबा का श्राप सबको दिखेगा। सभी लोग वहां से चले गए। कालान्तर में बाबा कीनाराम का दिया हुआ श्राप सबके सामने आ गया। राजा चेतसिंह जीवन भर पुत्र का मुख नहीं देख सके। वहां उपस्थित सब लोगों का यही हाल हुआ। चेतसिंह का किला अंग्रेजों के अधिकार में चला गया। अंग्रेज अफसर वारेन हेस्टिंग्स और चेतसिंह के बीच में भयानक युद्ध हुआ जिसमें चेतसिंह को हार का मुख देखना पड़ा। उन्हें महल छोड़कर भागना पड़ा। पूरा किला और मन्दिर अंग्रेजों के बूटों से अपवित्र हो गया। आज भी वह किला अभिशप्त की तरह जर- जर खड़ा अपनी बदहाली की कहानी स्वयम् कह रहा है। चारों तरफ पसरा गहन सन्नाटा बाबा कीनाराम के श्राप का गवाह है। किले में कभी किसी बच्चे की किलकारी नहीं गूंजी। हाँ, भूत-प्रेत और ऐसी ही तामसिक आत्माओं का वह किला सदा- सदा के लिए अड्डा अवश्य बन गया।

        जिस समय बाबा कीनाराम ने राजा चेतसिंह को श्राप दिया, उस समय वहां चेतसिंह के मंत्री सदानंद भी उपस्थित थे। बाबा जैसे ही जाने के लिए घूमे, सदानंद नंगे पांव दौड़ते हुए आये और बाबा के पैरों पर गिर पड़े। वे याचना करने लगे और सभी लोगों की ओर से बाबा से क्षमा मांगने लगे। बाबा कुछ पल शान्त रहने के बाद बोले--सदानंद, मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ। मेरा श्राप तो वापस नहीं होगा, लेकिन तुम्हारे लिए मेरा आशीर्वाद है कि जब तक तुम्हारे वंश में नाम् के साथ 'आनंद' लगा रहेगा, तुम्हारा वंश सदैव चलता रहेगा। बाबा विश्वनाथ की कृपा से तुम्हारे घर-परिवार में सदा आनंद ही रहेगा। आज भी सदानंद के वंशज अपने नाम के साथ 'आनंद' शब्द लगाते हैं। इस वंश की विद्वता पर आज भी पूरी काशी को गर्व महसूस होता है।

      उन्हीं दिनों में काशी में एक नर्तकी की चर्चा चारोँ तरफ जोरों पर थी। नाम् था उसका--छित्तन बाई। उसके नृत्य के साथ-साथ उसकी सुन्दरता और आवाज़ भी बहुत खूबसूरत थी। उसके नृत्य-गायन और सौंदर्य के लोग दीवाने थे। लेकिन लोग इस बात का आश्चर्य करते थे कि वह कभी घाघरा नहीं पहनती थी, केवल चूड़ीदार पायजामा और जनानी कुर्ती पहनती थी और ऊपर ओढ़नी रख लेती थी। दूसरी उसकी एक खासियत यह थी कि वह किसी के घर पर नृत्य और गायन करने नहीं जाती थी। लोग उसके नजदीक जाने के बहुतेरी कोशिश करते पर वह किसी को भी अपने पास नहीं फटकने देती थी। लेकिन जब राजा तेजसिंह का आदेश होता था तो उसे चेतसिंह किले में जाना पड़ता था। जन्माष्टमी के तीसरे दिन विशेष् उत्सव होता था।

        उस दिन आकाश में काले-काले बादल छाए हुए थे। महल के प्रांगण में श्वेत परिधान में काशी की प्रसिद्ध नर्तकियां बैठी थीं। राजा चेतसिंह अपने स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान थे। सभागार खचाखच भरा हुआ था। गंगा की ओर से लहराती शीतल हवाएं सभा को और भी मदहोश बना रहीं थीं। इत्र और महकते पुष्पों की सुगन्ध से जैसे  पूरा वातावरण अमरावती बन गया था।

      महफ़िल शुरू हुई। एक से एक बढ़ कर् नर्तकियां अपनी कला से लोगों का मन मोहने लगीं। राजा तेजसिंह के सामने स्वर्ण पात्र में मदिरा भरी रखी थी और वे धीरे-धीरे मदिरा पान कर् रहे थे। अन्य लोग भी सभा के मत्त वातावरण में डूबे हुए थे। वस्त्रों पर पड़े हुए इत्र की गन्ध  सबको मदहोश करने के लिए काफी थी। 

       सभी नर्तकियों का नृत्य समाप्त हो चुका था। तब सबसे अन्त में अपूर्व सुन्दरी छित्तन बाई जैसे ही खड़ी हुई, चारोँ और तालियों की आवाज से पूरा सभागार गूंजने लगा। एक विचित्र-सा जोश-सा छा गया चारों और। छित्तन बाई ने सिर झुका कर राजा को सलाम किया। उसके बाद सभा में उपस्थित सभी लोगों का अभिवादन कर् जैसे ही छित्तन बाई ने सुर भर कर राग लिया और फिर उसकी लय और ताल पर नृत्य शुरू किया, तभी बादलों से हल्की-हल्की बूंदों की फुहार पड़ने लगी। बूंदें पड़ने से छित्तन बाई की खूबसूरती में चार चांद लग गए।

       काला आकाश और उसमें विद्युत्-सी बलखाती दीपशिखा, तृप्ति और आनंद की वर्षा ! मदहोश राजा ने उस पड़ती फुहार में नृत्य जारी रखने का आदेश दे दिया। रस-विभोर होकर नाचती रही वह निष्कलंक नृयांगना न जाने कब तक। सभा को जैसे होश ही न रहा। जब नृत्य थमा तो लोगों को झटका- सा लगा। सभी उपस्थित लोग आत्मविमुग्ध हो चुके थे। उधर पानी की फुहारों से भीगे वस्त्र उस नर्तकी के तन से चिपक कर् मानों अप्सरा जैसा सौन्दर्य प्रदान कर् रहे थे जिसकी आज तक एक झलक किसी ने न देखी थी।

       राजा चेतसिंह के मन में न जाने क्या चल रहा था। उनका मन अभी भी नहीं भरा था। वे ऐसी स्थित में नर्तकी का झीने वस्त्रों में से बाहर झांकते सौन्दर्य का नजदीक से रसपान करना चाहते थे। उन्होंने हाथ के संकेत से उसे पास बुलाकर कहा--छित्तन बाई ! यह लो उपहार। सोने से भरा हुआ बटुआ छित्तन बाई को देते हुए बोले--अभी मन भरा नहीं तुम्हारे नृत्य से, ऐसा करो--गोपी बनकर अब कुछ नया दिखलाओ।

      छित्तन बाई भीगने के साथ-साथ थक भी चुकी थी। लेकिन राजाज्ञा का उल्लंघन करना अपराध होता--बस यही सोचकर मन मार कर् वह फिर नृत्य करने के लिए तैयार हो गयी। राजा चेतसिंह मन्त्री सदानंद बख्सी सिंह  की ओर देखकर बोले-- बख्सी सिंह ! तुरंत आगे के गोपी-नृत्य के लिए आवश्यक वस्त्र आदि का प्रबंध करो।

       सारा प्रबन्ध हो गया और जब छित्तन बाई अपने नए परिधान में उपस्थित हुई तो लोग उसे देखकर दंग रह गए। राजा की अनुमति पाकर छित्तन बाई फिर नये जोश से नृत्य और गायन करने लगी। उस समय पानी की फुहार पड़ना तो बन्द हो चुकी थी लेकिन वायु अपने ही मद में चल रही थी।

      एकाएक वायु का एक जोरदार झोंका आया और छित्तन बाई का लहँगा पिंडलियों से भी ऊपर उड़ गया। राजा को लगा कि छित्तन बाई के पिण्डली में कोई दाग़ है। छित्तन बाई ने राजा की नज़रों को देख लिया था। उसने तुरन्त अपना लहँगा नीचे कर वह दाग़ ढक लिया। राजा चेतसिंह ने हाथ के इशारे से नृत्य रोकने का आदेश दे दिया। छित्तन बाई का कोई राज था शायद वह खुल गया था। वह सिर झुकाकर चुपचाप खड़ी हो गयी। राजा ने एक बूढी दासी को आज्ञा दी और कहा--छित्तन बाई को अंदर ले जाओ कमरे में और इसका लहँगा ऊपर उठाकर देखो पिण्डली के पास यह दाग़ कैसा है। दासी पास के कमरे में उसे ले गयी और लहँगा उठाकर देखा कि उसकी पिण्डली के ऊपर कुष्ठ जैसा कोई गुलाबी दाग़ है। दासी ने दाग़ के बारे में राजा को अवगत करा दिया। सौन्दर्य की प्रतीक वह अपूर्व सुन्दरी अब घृणा की पात्र बन गयी थी। सभा में एक अजीब-सा गहरा सन्नाटा पसर गया था। राजा चेतसिंह आवेश में आकर बोले--एक सप्ताह के भीतर बनारस छोड़कर चली जा, वर्ना जिंदगी भर के लिए जेल में सड़ती रहेगी।

       जो महफ़िल अभी कुछ देर तक छित्तन बाई पर अपनी जान न्योछावर कर् रही थी, उसमें से अब कोई छित्तन बाई पर हो रहे उस अन्याय पर बोलने वाला न था। वह चुपचाप अवाक्-सी खड़ी थी। रोना चाह रही थी, पर रो भी न सकी। भला उस दाग़ में उसका क्या दोष ! मग़र उन पत्थरों के बुतों के बीच उसकी फरियाद सुनने वाला कोई न था। घोर अपमान की अग्नि में झुलसी हुई वह धीरे-धीरे सभागार से बाहर आ गयी। उसके साथ उसकी एक सहेली भी थी। वह बाबा कीनाराम के बारे में जानती थी। बाबा के बारे में उसने बतलाया और उसी समय छित्तन बाई को लेकर वह बाबा कीनाराम के पास पहुँच गयी। उसका मन उदास था, सोचा कि बाबा के पास पहुँच कर् कुछ पल बैठ जाऊंगी तो मन को शान्ति मिलेगा ।

              ।। 🌹जय बाबा किनाराम भगवान 🌹।।


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