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कल्पतरु दिवस B64

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१जनवरी१८८६ ई. के दिन दक्षिणेश्वर माँ काली मन्दिर में भगवान श्रीरामकृष्ण देव ने अपने अनेक गृही भक्तों को विभिन्न आध्यात्मिक अनुभूतियाँ प्रदान की थीं । तभी से प्रतिवर्ष यह दिन " कल्पतरु दिवस " के रूप में मनाया जाता है । जयश्री भगवान रामकृष्णपरमहंस देव  , माँ , स्वामी जी साष्टांग प्रणाम भक्ति दो प्रभु दया करो प्रभु  🙏🌼🌺🌼🙏

ईश्वर प्राप्ति B63

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    गुरु ने कहा,"मेरे बच्चे, यदि तुम भगवत्प्राप्ति की इच्छा रखते हो, तो अवश्य ही तुम्हें भगवान का लाभ होगा ।"शिष्य ने गुरु का मन्तव्य पूर्णतया नहीं समझा। एक दिन दोनों नहाने के लिए एक नदी में गये । गुरु ने शिष्य से कहा , "डुबकी लगाओ"और शिष्य ने डुबकी लगायी। एकदम गुरु ने शिष्य के सिर को पकड़ लिया और उसे पानी में डुबाये रखा । उन्होंने शिष्य को ऊपर नहीं आने दिया । जब वह लड़का ऊपर आने की कोशिश करते-करते थक गया, तब गुरु ने उसे छोड़ दिया और पूछा, "अच्छा, मेरे बच्चे, बताओ तो सही तुम्हें पानी के अन्दर कैसा लग रहा था ? " "ओफ़! एक साँस लेने के लिए मेरा जी निकल रहा था।" "क्या ईश्वर के लिए भी तुम्हारी इच्छा उतनी ही प्रबल है ? " "नहीं गुरु जी ।" गुरु जी ने कहा "तब ईश्वर प्राप्ति के लिए वैसी ही उत्कट इच्छा रखो , तुम्हें ईश्वर के दर्शन होंगे।"   जयश्रीभगवान रामकृष्ण परमहंस देव ,  जयश्री माँ सारदा देवी मन की शक्तियां तथा जीवन- गठन की साधनाएँ  🙏🌼🌺🙏जयश्रीस्वामी विवेकानंद देव 🙏🌺🌼🙏

SACCHA MITRA B62

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  सच्चा मित्र- ( एक कड़वी सच्चाई ) :- वर्तमान में मित्र की परिभाषा क्या है ? क्या आप सभी ने कभी सोचा है सच्चा मित्र कौन है ? आप कहेंगे कि मित्र - साथ में पढ़ने वाला है , साथ में खेलने वाला है , शोशल मीडिया पर रहने वाला , मेरा मित्र है । कार्यालय में साथ में काम करने वाला मेरा मित्र है , कहीं किसी नए नगर में गये वहाँ पर किसी ने सहायता कर दी वह मेरा मित्र बन गया । किसी ने कुछ भेंट कर दिया वह मित्र बन गया । ये जो मित्र शब्द है इसे हम बड़े आसानी से परिभाषित कर देते हैं । ये मित्र नही होते हैं ये समय समय पर मतलब, परिस्थिति ,वर्तमान समय की मांग कह लें, कभी कभार आपके लिए किसी परिस्थिति पर खड़े हो जाएं बस आपके काम आ जाएं तो हम समझ लेते हैं की क्या मित्र है । ऐसा व्यक्ति मित्र नही बस एक जान पहचान वाला व्यक्ति कहलाता है और कुछ नहीं ।यह एक कड़वी सच्चाई है परन्तु इनमें से कई लोग मेरी बातों से सहमत न हो किन्तु कहानी के अंत तक आते आते  मन के किसी कोने में मेरी बातों से सहमत तो होंगे लेकिन इसे प्रकट नहीं करेंगे । सबसे पहले साथ में पढ़ने वाला मित्र। वह मन ही मन आप से प्रतिस्पर्धा रखता है आप से ज्या...

महाजनपद युग भाग-१७ B61

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  शूरसेन महाजनपद :-  शूरसेन / सूरसेन / शौर सेनाई / शौरि महाजनपद के नाम से जाना जाता था । शूरसेन महाजनपद उत्तरी भारत का प्रसिद्ध जनपद था । जिसकी राजधानी मथुरा में थी , पहले इसे मधुरापुरी के नाम से जाना जाता था । राजा शत्रुघ्न के पुत्र " शूरसेन " के नाम पर शूरसेन महाजनपद का नाम रखा था । बाद में चंद्रवंशी यादवों ने यहाँ राज किया तब इसका नाम मथुरा रखा गया ।            इतिहासकारों का मत है कि लगभग एक सहस्त्र ईस्वी पूर्व से पांच सौ ईस्वी तक के युग को भारतीय इतिहास में जनपद व महाजनपद युग कहा जाता है । शूरसेन ने पुरानी मथुरा के स्थान पर नई नगरी बसाई थी । ।। जय श्री कृष्ण ।।     - प्रशान्त जे के शर्मा @ Copyright

महाजनपद युग भाग-१६ B60

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  कुंतल महाजनपद :-  द्वापर युग में महाभारत काल के समय इस नाम के तीन प्रदेशों का उल्लेख है -  १-मध्यदेश में काशी-कोसल के निकटवर्ती क्षेत्र । २- दक्षिण में कृष्णानदी के निकट का क्षेत्र ( अनेक पुराणों में कर्नाटक)को कुंतल देश कहा गया है । ३- कोंकण के निकट का क्षेत्र - ११वीं - १२वीं शती के अनेक अभिलेखों के अनुसार कुंतल देश का उल्लेख हुआ है , भीमा , वेदवती नदी का किनारा , शिमोगा , चीतलदुर्ग , बेलारी , धारवाड़ , बीजापुर के जिले रहे होंगे , कुछ लोगों का मानना है , कोंकण प्रदेश के पूर्व कोल्हापुर के उत्तर , हैदराबाद के पश्चिम कृष्णा मालपूर्वी और वर्धा नदी का किनारा माना जाता है । ।। जय श्री कृष्ण ।।।     - प्रशान्त जे के शर्मा @Copyright

महाजनपद युग भाग-१५ B59

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  वत्स महाजनपद :- वर्तमान का उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद जो कि वर्तमान में प्रयागराज हो गया है ।तथा मिर्जापुर जिला इसके अंतर्गत आते थे , इस जनपद की राजधानी कौशाम्बी(जिला- प्रयागराज उ.प्र.) थी ।ऐतरेय ब्राम्हण में जिन वंश के लोगों का उल्लेख है वे इसी देश के निवासी थे । कौशाम्बी में जनपद की राजधानी प्रथम बार पांडवों के वंशज 'निचक्षु' ने बनायी थी ।  वत्स देश का उल्लेख वाल्मीकि रामायण में भी मिलता है । रामायण काल में गंगा नदी वत्स व कोसल जनपदों की सीमा पर बहती थी । महाभारत के अनुसार भीमसेन ने वत्सभूमि पर विजय प्राप्त की थी । ।। जय श्री कृष्ण ।।     - प्रशान्त जे के शर्मा @Copyright 

महाजनपद युग भाग-१४ B58

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  मल्ल महाजनपद :-  पूर्वी उत्तर प्रदेश का क्षेत्र , मल्ल महाजनपद में आता था , इसकी राजधानी कुशीनगर थी । वाल्मीकि रामायण में मल्लदेश का सर्वप्रथम उल्लेख मिलता है। भगवान रामचंद्र जी ने लक्ष्मण-पुत्र चन्द्रकेतु के लिए मल्लदेश का निर्माण कराया था ।बौद्ध साहित्य में मल्लदेश की दो राजधानीयों का वर्णन क्रमशः है - १- कुशावती व २- पावा ।। जय श्री कृष्ण ।।  @Copyright  प्रशान्त जे के शर्मा ।

महाजनपद युग भाग- १३ B57

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  मत्स्य या मच्छ महाजनपद:-  वर्तमान में अलवर , भरतपुर , जयपुर ज़िले के क्षेत्र सम्मलित थे ।महाभारत काल का एक प्रसिद्ध जनपद था । इस देश में विराट का राज था यहां की राजधानी उपपल्लव नामक नगर में थी ।विराटनगर मत्स्य देश का दूसरा सबसे प्रमुख नगर था ।भीम व सहदेव ने भी मत्स्यों , मत्स्य देश पर विजय प्राप्त की थी ।                     अलवर के एक भाग में शाल्व देश था , जो मत्स्य का पार्श्ववर्ती जनपद था । पांडवों ने मत्स्य देश में विराट के यहाँ पर रहकर अपने अज्ञातवास का एक वर्ष बिताया था । @Copyright    ।। जय श्री कृष्ण ।।       - प्रशान्त जे के शर्मा

महाजनपद युग भाग-१२ B56

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  मगध महाजनपद :- बौद्ध काल एवं परवर्तीकाल में उत्तर भारत का सबसे शक्तिशाली जनपद था। इसका क्षेत्र दक्षिण बिहार का क्षेत्र था जो वर्तमान में पटना , गया जिला इनमें सम्मलित थे । महाभारत के समय इसकी राजधानी "गिरिव्रज" थी । महाभारत के समय यहां का राजा जरासंघ था ।    मगध साम्राज्य की सीमा उत्तर गंगा से दक्षिण विन्ध्यपर्वत तक था , पूर्व में चम्पा से पश्चिम में सोननदी तक विस्तृत थी ।मगध साम्राज्य के "विश्व स्फटिक" नामक राजा ने आर्यसभ्यता का प्रचार किया था । मगध की प्राचीन राजधानी राजगृह थी , यह पांच पहाड़ियों से घिरा नगर था । कालान्तर में मगध साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र में स्थापित हुई बाद में मगध ने कौशल , वत्स , अवंति , को अपने महाजनपद में मिला लिया । इस प्रकार प्राचीन मगध का इतिहास ही भारत का इतिहास बना ।   ।। जय श्री कृष्ण ।। @Copyright  प्रशान्त जे के शर्मा 

महाजनपद युग भाग-११ B55

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  वृज्जि या वज्जि (महाजनपद) - वृज्जि उत्तर बिहार का बौद्ध वज्जि , वृज्जि का ही रूपांतरण है ।बुद्ध के जीवन काल में मगध सम्राट अजातशत्रु और वृज्जि गणराज्य में बहुत दिनों तक संघर्ष चलता रहा । ।। जय श्री कृष्ण ।।  - प्रशान्त जे के शर्मा @Copyright

महाजनपद युग भाग-१० B54

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पंचाल (महाजनपद) - पंचाल वर्तमान में पश्चिम उत्तर प्रदेश का बरेली , बदायूँ , फर्रुखाबाद , रुहेलखंड  जिलों से परिवृत प्रदेश का प्राचीन नाम है ।  यह कानपुर से वाराणसी के बीच गंगा नदी के गंगा के मैदान में फैला हुआ था ।  इसकी दो राजधानी थीं ।  १- उत्तर पांचाल - उत्तर पांचाल की राजधानी अहिच्छत्र थी । २- दक्षिण पांचाल - दक्षिण पांचाल की राजधानी कांपिल्य थी ।         कनिंघम के अनुसार वर्तमान में रुहेलखंड उत्तर पांचाल और दोआबा दक्षिण पांचाल था। पांचाल वर्तमान रुहेलखंड का प्राचीन नाम था । मान्यता है कि इसका यह नाम राजा हर्यश्व के पांच पुत्रों के कारण पड़ा था । श्री राय चौधरी का मत है कि पांचाल पांच प्राचीन कुलों का सामूहिक नाम था -  १ किवी २ केशी ३ सृंजय ४ तुर्वसस ५ सोमक । द्रोणाचार्य ने अर्जुन की सहायता से पंचालराज द्रुपद को हराकर उनके  उत्तर पांचाल को ले लिया था। ।। जय श्री कृष्ण ।।       -  प्रशान्त जे के शर्मा @Copyright

महाजनपद युग भाग-९ B53

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  गांधार (महाजनपद) - गांधार महाजनपद वर्तमान में पाकिस्तान का पश्चिमी भाग एवं अफगानिस्तान का पूर्वी क्षेत्र है । प्रमुख नगर - पुरुष पुर (आधुनिक पेशावर नगर) एवं तक्षशिला इसकी राजधानी थी । इसका अस्तित्व६०० ईसा पूर्व से ११वीं सदी तक रहा । कुषाण शासन के समय यहां बुद्ध धर्म बहुत फला फूला पर बाद में  मुस्लिम आक्रमण के कारण इसका पतन हो गया । १२५३ ईस्वी में चीन के सम्राट कुबलाखां ने गांधार को जीतकर यहां के हिन्दु राज्य की समाप्ति कर दी ।         इस प्रदेश का वर्णन महाभारत और सम्राट अशोक के शिलालेखों में मिलता है । महाभारत के अनुसार धृतराष्ट्र की रानी और युवराज दुर्योधन की माँ गांधारी , गंधार की राजकुमारी थीं । यह पाकिस्तान के रावलपिंडी और पेशावर जिलों में आता है । तक्षशिला एवं पुष्कलावती यहीं के प्रसिद्ध नगर थे ।          "कैकय" देश इसके पूर्व में स्थित था , कैकय-नरेश युधाजित के कहने से अयोध्यापति भगवान रामचंद्र जी के भाई भरत ने गंधर्व देश को जीता था और तक्षशिला एवं पुष्कलावती नगर को बसाया था । चंद्रगुप्त मौर्य साम्राज्य में सम्पूर्ण गांधार ...

महाजनपद युग भाग-८ B52

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चेदि या चेति (महाजनपद) - चेदि या चेति महाजनपद वर्तमान में बुंदेलखंड का दक्षिणी भाग व जबलपुर का उत्तरीभाग सम्मलित था । महाभारत काल में शिशुपाल यहां का प्रसिद्ध राजा था । वर्तमान में ग्वालियर क्षेत्र में वर्तमान चंदेरी कस्बा ही प्राचीन काल के चेदि राज्य की राजधानी बतलाया गया है ।  ।। जय श्री कृष्ण ।।           -  प्रशान्त जे के शर्मा  @Copyright

महाजनपद युग भाग-७ B51

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  कुरु (महाजनपद) - वर्तमान में हरियाणा , दिल्ली का यमुना नदी के पश्चिम वाला अंश सम्मलित था । इसकी राजधानी हस्तिनापुर एवं इन्द्रप्रस्थ थी । ( इन्द्रप्रस्थ - वर्तमान दिल्ली ) व हस्तिनापुर जो कि उत्तर प्रदेश राज्य के मेरठ ज़िले में स्थित एक नगर है । पुराण में राजा कुरु के नाम पर इसका नाम कुरु महाजनपद पड़ा । महाभारत के पश्चात कुरुवंश का अंतिम राजा निचक्षु थे , राजा परिक्षित के वंशज ( युधिष्ठिर से ७ वीं पीढ़ी में ) थे । हस्तिनापुर के गंगा द्वारा बहा दिए जाने पर अपनी राजधानी वत्स  देश के कौशाम्बी नगरी को बनाया । तथ्य :- १- हिमालय के उत्तर का भाग 'उत्तर कुरु ' और हिमालय के दक्षिण का भाग  'दक्षिण कुरु ' के नाम से जाना जाता था । २- प्रसिद्ध चंद्रवंशी राजा कुरु के पिता का नाम " संवरण " व माता का नाम " तप्ती "  था ।      राजा कुरु की दो पत्नियां थीं -  " सुभांगी " व " वाहिनी " । वाहिनी के पांच पुत्र हुये । जिनके कनिष्ठ का नाम जनमेजय था- जिनके वंशज धृतराष्ट्र व पांडु हुए । ।। जय श्री कृष्ण ।।          - प्रशान्त जे के शर्मा .  @Copy...

महाजनपद युग भाग-६ B50

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  कौशल (महाजनपद)  -   उत्तर भारत का प्रसिद्ध जनपद राजधानी 'अयोध्या' थी । कौशल महाजनपद में फैज़ाबाद(वर्तमान में- अयोध्या) , गोंडा , बहराइच के क्षेत्र सम्मलित थे । यह जनपद सरयू नदी ( गंगा नदी की सहायक नदी ) के तटवर्ती प्रदेश में स्थित था । चित्रकूट तक सीमा थी । कौशल महाजनपद का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है ।  🌹अयोध्या भगवान श्री राम की जन्मभूमि भी है ।🌹 ।। जय श्रीराम जय श्रीकृष्ण ।।    - प्रशान्त जे के शर्मा @Copyright

महाजनपद युग भाग-५ B49

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काशी (महाजनपद) -  काशी का दूसरा वर्तमान नाम वाराणसी है । हरिवंश पुराण में उल्लेख आया है , काशी को बसाने वाले 'पुरूखा' के वंशज राजा ' काश ' थे । अतः उनके वंशज काशी कहलाये ।      एक उल्लेख और है -  पार्वती माता के मुक्तामय कुंडल गिर जाने से इस क्षेत्र को मुक्त क्षेत्र की संज्ञा दी गई एवं इसकी अकथनीय परमज्योति के कारण तीर्थ का नामकरण काशी किया गया । ।। जय श्री कृष्ण ।।   - प्रशान्त जे के शर्मा @Copyright

महाजनपद युग भाग-४ B48

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कंबोज (महाजनपद) -  कंबोज देश का विस्तार कश्मीर से हिंदुकुश तक था । (वर्तमान हिंदुकुश-पाकिस्तान , अफगानिस्तान ) है । कौटिल्य अर्थशास्त्र में कंबोज को चंद्रगुप्त मौर्य के गणराज्य , साम्राज्य में विलीन रहा होगा ऐसा बतलाया गया है ।            हिंदुकुश उत्तरी पाकिस्तान के विवादित भाग से मध्य अफगानिस्तान तक विस्तृत एक ८०० कि. मी. चलने वाली पर्वत श्रृंखला है । इसका सबसे ऊंचा पहाड़ पाकिस्तान के खैबर - पख्तूनख्वा प्रान्त के चित्राल ज़िले में स्थित ७७०८ मीटर  ( २५२८९ ) फ़ुट लम्बा तिरिच मीर पर्वत है ।हिंदुकुश पामीर पर्वतों से जाकर जुड़ते हैं और हिमालय की एक उपशाखा माने जाते हैं।  ।। जय श्री कृष्ण ।।         - प्रशान्त जे के शर्मा @Copyright

महाजनपद युग भाग-३ B47

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  अश्मक (महाजनपद) -  अश्मक महाजनपद नर्मदा नदी , गोदावरी नदी , के बीच इसकी राजधानी 'पाटन' थी। वर्तमान में महाराष्ट्र कहते है , इसका उल्लेख बौद्ध साहित्य में मिलता है । वहीं कूर्म पुराण , बृहतसंहिता में अश्मक को उत्तर भारत का अंग माना गया है । इसके अनुसार पंजाब के समीप का क्षेत्र आता है परन्तु        राजशेखर जी ने अपनी काव्य-मीमांसा में इसकी स्थिति दक्षिण भारत में माना गया है । जिसमें महाराष्ट्र , विदर्भ , कुंतल , कांची , केरल , क्रथेशिक , सुर्पारक , चोल , पांडय , कोंकण , आदि जनपदों का समावेश बतलाया गया है ।  ।। जय श्री कृष्ण ।।        - प्रशान्त जे के शर्मा  @Copyright

महाजनपद युग भाग-२ B46

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अवंती (महाजनपद) - ६१५-६३०ई. में कहा जाता है शंकराचार्य के समकालीन अवंती-नरेश सुधन्वा ने जैनधर्म का उत्कर्ष सूचित करने के लिए प्राचीन अवंतिका का नाम उज्जयिनी कर दिया था , यह केवल कपोल कल्पना मात्र है , मध्यकाल में इस नगरी को मुख्यतः उज्जैन ही कहा जाता था । १७५०-१८१०ई. तक सिंधिया नरेशों का शासन स्थापित था और उज्जैन इनकी राजधानी थी बाद में ग्वालियर को राजधानी बनाया गया ।              आधुनिक मालवा का प्रदेश जिसकी राजधानी उज्जयिनी और महिष्मति थीं । उज्जैन मध्यप्रदेश का एक प्रमुख नगर है , प्राचीन संस्कृत में एवं पाली साहित्य में अवंति , उज्जयिनी का सैकड़ों बार उल्लेख है । पुराणों के अनुसार अवंति की स्थापना यदुवंशी क्षत्रियों द्वारा की गई थी ।महाभारत काल में सहदेव द्वारा अवंति पर विजय का उल्लेख है ।             उज्जैन में ही भगवान श्री कृष्ण की शिक्षा भी हुई थी ।               ।। जय श्री कृष्ण ।।  - प्रशान्त जे के शर्मा . @Copyright               ...

महाजनपद युग भाग-१ B45

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डॉ. वासुदेवशरण का मत है कि लगभग एक सहस्त्र ईस्वी पूर्व से पांच सौ ईस्वी तक के युग को भारतीय इतिहास में जनपद या महाजनपद युग कहा जाता है l हर एक भाग में एक एक जनपद या महाजनपद के विषय में बताया जाएगा ।  अंग देश (महाजनपद) :-  अंग देश वर्तमान में बिहार राज्य के भागलपुर एवं मुंगेर जिलों का समवर्ती था । अंग कि राजधानी चंपा थी । आज भी भागलपुर के एक मुहल्ले का नाम चंपा नगर है , राजा दशरथ के मित्र लोमपद और अंगराज कर्ण ने यहाँ राज किया था । अंगदेश का उल्लेख अथर्ववेद में भी मिलता है । महाभारत काल में अंग और मगध साम्राज्य एक ही राज्य के दो भाग थे ।           मगध के राजकुमार बिंबसार अपने पिता की मृत्यु तक अंग देश के शासक भी रहे । बिंबसार ने अंगराज ब्रह्मदत्त को मारकर उसका राज्य मगध में मिला लिया था ।           महाभारत के समय जरासंघ से जीतकर अंगदेश के राजा घोषित हुए थे ,महारथी कर्ण । दुर्योधन ने महारथी कर्ण को अंगदेश का राजा घोषित किया था । ।। जय श्री कृष्ण ।।   - प्रशान्त जे के शर्मा. @Copyright

श्राप का प्रभाव B44

श्राप का प्रभाव ईश्वर तक को सहना पड़ता है - माता गान्धारी द्वारा दिया गया श्राप भगवान श्रीकृष्ण को भी सहना पड़ा था ।अब बात करते हैं - महापंडित रावण कि, इनको भी श्राप मिला था। जिसके कारण रावण भी श्राप से अछूते नहीं रहे । महाज्ञानी रावण का श्राप के ही कारण सर्वनाश हो गया ।रघुवंश भगवान श्रीराम के पूर्वज थे । उनका नाम अनरण्य था , जब रावण विश्व विजय होने निकला तो राजा अनरण्य से युद्ध हुआ।युद्ध में अनरण्य की मृत्यु हो गई परन्तु मरने से पूर्व अनरण्य ने रावण को श्राप दे दिया की मेरे ही वंश में उत्त्पन्न व्यक्ति तेरी मृत्यु का कारण बनेगा ।भगवान श्रीराम ने इसी वंश में जन्म लेकर रावण का वध किया ।  दूसरी घटना है -महाज्ञानी रावण की सगी बहन सूर्पणखा के पति का नाम विद्युत जिव्ह था । वो कालकेय नाम के राजा का सेनापति था । रावण जब विश्व विजय होने निकला तो कालकेय से युद्ध हुआ , इस युद्ध में रावण ने विद्युत जिव्ह का वध कर दिया । तब सूपर्णखा ने मन ही मन अपने भाई रावण को श्राप दे दिया कि मेरे ही कारण तेरा सर्वनाश होगा । रामायण में हुआ भी यही सूर्पणखा ने रावण को भड़काकर युद्ध करा अपना बदला ले लिया । इसी कार...

हाय और श्राप में अंतर B43

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।। जय श्री कृष्ण ।।  -  प्रशांत जे के शर्मा  

श्री रामकृष्णदेव B42

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 यदि ईसा मसीह व बुद्ध की पूजा करने में कोई हानि नहीं है , तो इस मनुष्य ( श्री रामकृष्ण परमहंस ) को पूजने में क्या हानि हो सकती है , जिसके विचार या कर्म को अपवित्रता कभी छू तक नहीं गयी ,  जिसकी अन्तदृष्टिप्रसूत बुद्धि से अन्य पैगम्बरों - जिनमें से सभी एक देश दर्शी रहे हैं - की बुद्धि में आकाश पाताल का अंतर है ?  जिन्हें साक्षात माँ काली दर्शन दें एवं उनके हाथ से भोजन ग्रहण करें , साथ में खेल भी खेलें जब चाहें बात कर लें । वह स्वयं कोई ईश्वर के अवतार ही हैं ।  ।। जय श्री राम कृष्ण देव भगवान ।।                  -   स्वामी विवेकानंद जी @Copyright

ईश्वर दर्शन B41

 एक बार स्वामी श्रीरामकृष्ण भगवान ने अपनी पत्नी (माँ) सारदामणि को मानव - जीवन के उद्देश्य तथा कर्तव्य के सम्बन्ध में सभी प्रकार की शिक्षा प्रदान करने लगे ।इन्हीं दिनों उन्होंने पत्नी से कहा था , " जैसे चाँद मामा सभी बच्चों के मामा हैं , वैसे ही ईश्वर भी सबके अपने हैं ; सभी को उन्हें पुकारने का अधिकार है । जो भी उन्हें पुकारेगा उसे वे दर्शन देकर कृतार्थ करेंगे । तुम पुकारो तो तुम्हें भी उनका दर्शन प्राप्त होगा । "            -  जीवन की रूपरेखा पेज - ७ श्री रामानन्द चटोपाध्याय           - माँ की बातें  ।। जय श्री कृष्ण ।।            प्रशांत जे के शर्मा @Copyright

महामाया B40

 गृहिणी पेज - २४१ ( संक्षेप में ) दिसम्बर१९१८ के अन्त में एक दिन श्रीमाँ सारदा देवी अपने मायके जयरामवाटी में सदर दरवाजे पर बैठी थीं । उनके दो भाइयों में आपसी तनातनी हो गई ।बात छोटी सी थी । धान को खेत से लाने के लिए एक भाई ने रास्ता संकरा कर दिया था । दूसरे भाई ने आपत्ति जताई , दोनों भाइयों के आपसी झगड़े को श्रीमाँ ने शान्त कराया ।  फिर जब श्रीमाँ ने अपने  क्रोध को पलभर में शान्त किया तब वे सोचने लगी । क्रीड़ा भूमि के समान इस संसार के स्वार्थ - संघर्ष के पीछे जो शाश्वत शान्ति विराजमान है , वह उनके आ जाने से वे मुस्कुराकर कहने लगीं , "महामाया की कैसी माया है ! यह अनन्त संसार पड़ा हुआ है; ये वस्तुएँ भी पड़ी रहेंगी - क्या लोग इतना भी नहीं समझते ?" इतना कहकर वे हँसते - हँसते लोटपोट हो गईं , वह हँसी रोके नहीं रुकती थी ।                                              - स्वामी गम्भीरानन्द                         ...

विष्णु भगवान B39

*"पुरुषोत्तम मास"*  भगवान विष्णु के १६ नाम  इसमें मनुष्य को किस किस अवस्थाओं में भगवान विष्णु को किस किस नाम से स्मरण करना चाहिए, इसका उल्लेख किया गया है :- (१) औषधि लेते समय - विष्णु ; (२) भोजन के समय - जनार्दन ; (३) शयन करते समय - पद्मनाभ : (४) विवाह के समय - प्रजापति ; (५) युद्ध के समय - चक्रधर ;  (६) यात्रा के समय - त्रिविक्रम ; (७) शरीर त्यागते समय - नारायण;  (८) पत्नी के साथ - श्रीधर ; (९) नींद में बुरे स्वप्न आते समय - गोविंद ; (१०) संकट के समय - मधुसूदन ; (११) जंगल में संकट के समय - नृसिंह ; (१२) अग्नि के संकट के समय - जलाशयी ; (१३) जल में संकट के समय - वाराह ; (१४) पहाड़ पर संकट के समय - रघुनंदन; (१५) गमन करते समय - वामन;  (१६) अन्य सभी शेष कार्य करते समय - माधव ।। औषधे चिंतयते विष्णुं , भोजन च जनार्दनम | शयने पद्मनाभं च विवाहे च प्रजपतिं || युद्धे चक्रधरं देवं प्रवासे च त्रिविक्रमं | नारायणं तनु त्यागे श्रीधरं प्रिय संगमे || दु:स्वप्ने स्मर गोविन्दं संकटे मधुसूदनम् | कानने नारसिंहं च पावके जलशायिनाम || जल मध्ये वराहं च पर्वते रघुनन्दनम् | गमने वामनं चै...

श्री माँ सारदा शक्ति B38

वह ( श्री माँ ) सारदा है -  सरस्वती है । ज्ञान देने के लिये आई है। ये जो मन्दिर में माँ (काली) है , और जो नौबतखाने में है (श्री माँ ) - अभेद है । नौबतखाने में जो (श्री माँ ) है , यदि किसी कारण से वह किसी पर रुष्ट हो जाए तो उसकी रक्षा करने की मेरी भी क्षमता नहीं है ।                                            - श्री स्वामी राम कृष्ण परमहंस ।। जय श्री कृष्ण ।। प्रशांत जे के शर्मा 

आज का परिवेश B37

आज के परिवेश में मनुष्य का जो स्वभाव है , ( दाँतो के बीच में जैसे जीभ को काट कर नहीं हटाया जा सकता ) उसी प्रकार हमें धूर्त मनुष्यों के बीच में रहते हुए। शान्ति और धीरज से काम लेना चाहिए ।             अगर आप देखें हमारी हाथ की उंगलियां एक सी नहीं होती है , इस कारण कोई एकाध उंगली को अलग निकाल नहीं देता ।हमें अपनी सभी इच्छाओं को दबाकर अच्छे बुरे मनुष्यों को , सबको साथ लेकर चलना पड़ता है । ।। जय श्री कृष्ण ।। प्रशांत जे के शर्मा  @Copyright

अवंतिका B36

 उज्जैन स्वर्ग है क्यौ है  जानते हैं ?  एक मात्र स्थान जहाँ शक्तिपीठ भी है, ज्योतिर्लिंग भी है, कुम्भ महापर्व का भी आयोजन किया जाता है ।यहाँ साढ़े तीन काल विराजमान है। "महाकाल,कालभैरव, गढ़कालिका और अर्धकाल भैरव।"  यहाँ तीन गणेश विराजमान है।  "चिंतामन,मंछामन, इच्छामन" यहाँ 84 महादेव है,यही सात सागर है। ये भगवान श्रीकृष्ण की शिक्षा स्थली है। ये मंगल ग्रह की उत्पत्ति का स्थान है। यही वो स्थान है जिसने महाकवी कालिदास दिए।उज्जैन विश्व का एक मात्र स्थान है । जहाँ अष्ट चरिंजवियो का मंदिर है,यह वह ८ देवता है जिन्हें अमरता का वरदान है (बाबा गुमानदेव हनुमान अष्ट चरिंजीवि मंदिर)।राजा विक्रमादित्य ने इस धरा का मान बढ़ाया।विश्व की एक मात्र उत्तर प्रवाह मान क्षिप्रा नदी!इसके शमशान को भी तीर्थ का स्थान प्राप्त है *चक्र तीर्थ* ।और तो और पूरी दुनिया का केंद्र बिंदु* _(Central Point)_ है ।महाकाल जी का मंदिर ।उज्जैन का प्राचीन नाम है- *अवंतिका*, *अवंति*, *अवंतिकापुरी*। ।। जय श्री कृष्ण ।। *जय श्री महाकाल* 🕉🔱🌹🔱🕉 प्रशांत जे के शर्मा 

मनुष्य का जीवन B35

 "मनुष्य का जीवन एकदम बीच समुद्र में किसी दुर्ग (किला) की भाति होती है , जो चारों ओर जल से घिरा होता है । तट से दूर - बीच समुद्र में खड़ा हुआ- चारों ओर खारे पानी से घिरा हुआ होता है । ज्वार - आता है , तो उमड़ती लहरें इसकी दीवारों से आ-आकर निरन्तर टक्करें मारती हैं , टक्करें मारकर इसे मिट्टी में मिला देना चाहती हैं । भाटा - आता है तो सागर की घटती हुई लहरें मानो पैर खींचकर  इसे जल में बहा ले जाना चाहती हैं । समुद्र से उठनेवाला पहला बादल इसी पर बरसता है । समुद्री तूफानी हवाएँ दुर्ग की दीवारों से टकराती हैं । इन सभी मुसिबतों को झेलते हुए इसे अकेले ही खड़े रहना पड़ता है । वह भी मात्र अपने अंदर के भीतर बह रहे मीठे जल के स्रोत के आधार पर ।" प्रशांत जे के शर्मा ।। जय श्री कृष्ण ।।

ॐ शब्द का महत्व B34

 *ॐ का महत्व * ॐ , ओउम् तीन अक्षरों से बना है,  अ उ म्  "अ" का अर्थ है उत्पन्न होना, "उ" का तात्पर्य है उठना,  उड़ना अर्थात् विकास,  "म" का मतलब है मौन हो जाना अर्थात् "ब्रह्मलीन" हो जाना, ॐ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और पूरी सृष्टि का द्योतक है। ॐ का उच्चारण शारीरिक लाभ प्रदान करता है। जानिए ॐ कैसे है स्वास्थ्यवर्द्धक  और अपनाएं आरोग्य के लिए ॐ के उच्चारण का मार्ग... *1. ॐ और थायराॅयडः-*  ॐ का उच्‍चारण करने से गले में कंपन पैदा होती है जो थायरायड ग्रंथि पर सकारात्मक प्रभाव डालता है। *2. ॐ और घबराहटः-*  अगर आपको घबराहट या अधीरता होती है तो ॐ के उच्चारण से उत्तम कुछ भी नहीं। *3. ॐ और तनावः-*  यह शरीर के विषैले तत्त्वों को दूर करता है, अर्थात तनाव के कारण पैदा होने वाले द्रव्यों पर नियंत्रण करता है। *4. ॐ और खून का प्रवाहः-*  यह हृदय और ख़ून के प्रवाह को संतुलित रखता है। *5. ॐ और पाचनः-*  ॐ के उच्चारण से पाचन शक्ति तेज़ होती है। *6. ॐ लाए स्फूर्तिः-*  इससे शरीर में फिर से युवावस्था वाली स्फूर्ति का संचार होता है। *7. ॐ और थक...

बारिश B33

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    चित्त मन में हो रहा उथल पुथल बादल की गरज, बारिश की     झमाझम ने कर दिया मन में उथल पुथल । मोर की नाच ने मन     को किया प्रसन्न। तब जाकर मन हुआ प्रशांत ।                     प्रशांत जे के शर्मा     ।। जय श्री कृष्ण ।। @Copyright

श्री ८ पत्नियां (श्रीकृष्ण भगवान) B32

 जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं । श्री कृष्ण भगवान को पुष्पों में पारिजात का पुष्प अधिक प्रिय है । उसमें भी शरद ऋतु की शीतल प्रभात - पवन में ओस से भीगा पारिजात पुष्प अधिक प्रिय है ।  फलों में आम्र फल अच्छा लगता है - पका हुआ ,अधपका सिन्दूरी रंग का आम्र फल वृक्ष के सिरे पर धूप में चमकता हुआ । पक्षियों में - मृग पर्जन्य पंख । रसों में - गोरस । खाने में - दधि-मिश्रित नमक डाला हुआ । भगवान श्री कृष्ण जी के श्री आठ श्रीपत्नियों के नाम क्रमशः है- १- माँ रुक्मिणी २- माँ जाम्बवती ( आदिवासी वन कन्या ) ३- माँ सत्यभामा ( यादव कन्या  ) ४- माँ सत्या ५- माँ मित्रविन्दा ६- माँ लक्ष्मणा ७- माँ भद्रा ८- माँ कालिन्दी ( जल कन्या ) ।। जय श्री कृष्ण ।। प्रशांत जे के शर्मा 

स्वामी विवेकानंद वचन B31

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१- ईर्ष्या एक राष्ट्रीय पाप है । २- मैंने एक बहुत बड़ी गलती की थी दूसरे पर निर्भर रह कर जीने की । ३- कोई मदत करें इसकी अपेक्षा करना मूर्खता है । ४- सबसे बड़ा त्याग महत्वाकांक्षाओं का त्याग करना है । ५- सुख क्या है , सुख मानव जाती का चरम लक्ष्य "ज्ञान" लाभ   है । मनुष्य का अन्तिम धेय सुख नहीं वरन ज्ञान है । सुख व आनंद का तो एक न एक दिन अंत हो ही जाता है ।अतः यह मान लेना की चरम लक्ष्य सुख है । यह हमारी भूल है । " वह चरम सुख 'सुख' नही वरन "ज्ञान" है । संघर्ष के दिनों में । ।। स्वामी विवेकानंद जी ।। जय श्री कृष्ण ।। प्रशांत जे के शर्मा

अन्तः करण B30

चाँदनी रात में चन्द्रमा की ओर ताकती हुई  मैं हाथ जोड़कर कहती , ' अपनी ज्योत्स्ना की भाँति  मेरा अन्तः करण निर्मल कर दो ।'... फिर रात्रि में जब चन्द्रमा उठता , तब गंगा के स्थिर जल में उसका प्रतिबिंब देख  सजल नयनों से भगवान से प्रार्थना करती  ,  ' चन्द्रमा में भी कलंक है , पर मेरे मन में कोई दाग न रहे । ' -  श्री माँ सारदा देवी । राम कृष्ण मठ , माँ की बातें । प्रशांत जे के शर्मा ।। जय श्री कृष्ण ।।

जीवन के सफलता का मूलमंत्र B29

आप जीवन में तभी सफल होंगे जब आप अपने कार्य के प्रति जागरूक एवं ईमानदार , परिश्रमी होंगे ।आपका ' व्यवहार ' अपने साथियों के साथ अच्छा रहेगा । उन्हें आपको साथ में लेकर चलना होगा । सबसे बड़ी बात आपको अपने साथियों पर विश्वाश करना पड़ेगा । एक बात और आपको भी आपके " भाग्य " से ईमानदार परिश्रमी साथी मिले । यही आपके सफलता का रहस्य होगा ।  तो जीवन में सफल होने का मूलमंत्र है, सभी के साथ अच्छा व्यवहार , आपके जीवन में आने वाले व्यक्ति पर विश्वास करना होगा एवं साथ ही साथ आपका अपना भाग्य की कैसा व्यक्ति आप को मिलेगा ।  संक्षेप में कहें तो जीवन में सफलता का मूलमंत्र है - १- सभी से अच्छा व्यवहार । २- अपने साथियों पर विश्वास । ३- आपका अपना भाग्य । ४- आपका कर्म ( अपने कार्य  के प्रति ईमानदारी से कठिन परिश्रम करना ) । प्रशांत जे के शर्मा ।। जय श्री कृष्ण ।।

आजमगढ़ भाग - २ - B28

आजमगढ़ तीर्थों का भी स्थान है - अत्रि मुनि और सती अनसुइया के तीनों बेटे - ऋषिवर दुर्वासा , ऋषिवर चंद्रमा , ऋषिवर दत्तात्रेय ने इस शहर को अपने तप और धाम के लिए ऐसे ही नहीं चुना होगा । तीनों भाइयों ने अपने पिता व माता की आज्ञा से इसी जिले के तमसा नदी के पावन तट पर यज्ञ किया । यही नहीं , राजा परीक्षित की सर्पदंश से हुई मृत्यु के बाद इनके बेटे जनमेजय ने इसी जिले के अवंतिकापुरी में सर्प यज्ञ किया था । कहा जाता है कि सर्प यज्ञ के लिए बनाया गया हवन कुंड आज भी विशाल सरोवर के रूप में मौजूद है । मान्यता यह भी है कि भगवान शिव के मना करने के बावजूद उनकी पत्नी सती जब अपने पिता के यहां बिना बुलाए धार्मिक आयोजन में गई तो उपेक्षा होने पर हवन कुंड में कूदकर अपनी जान दे दी । गुस्साए शिव जी जब सती का शव लेकर ब्रम्हांड का चक्कर काट रहे थे तो सती के पैर का कुछ हिस्सा इस जिले के पल्हना में गिरा। इसी स्थान को पालहमेश्वरी धाम के नाम से जाना जाता है । सिखों के गुरु तेग बहादुर ने भी आजमगढ़ आना जरूरी समझा । निजामाबाद में वे बीस दिन रुके । तपस्या की। यहां पर सिखों का १४ वां हस्तलिखित धार्मिक ग्रंथ आज भी मौजूद है । ...

आजमगढ़ भाग- १ - B27

तमसा नदी के तट पर आजमगढ़ बसा है। आजमगढ़ ' आजम ' गढ़ है , बहु विधि कार्यकलापों का । नगर महान लोगों का संगम है । इसका इतिहास बेजोड़ है । ऐतिहासिक आईने में आजमगढ़ का अक्स देखने के लिए हमें पन्द्रहवीं सदी में जाना होगा । इस कालखंड में फतेहपुर के पास एक गांव में चंद्रसेन सिंह नाम के एक राजपूत थे । उनके दो बेटे सागर सिंह और अभिमन्यु सिंह हुए । इनमें अभिमन्यु मुगल सेना में सिपाही हो गया । उसकी प्रतिभा और योग्यता की चर्चा जहांगीर के दरबार तक जा पहुंची थी । उन्हीं दिनों जौनपुर के पूर्वी क्षेत्रों में कई विद्रोह हुए । इन विद्रोहों पर काबू पाने के लिए सम्राट ने इसे ही लगाया । जहांगीर के प्रेम से अभिभूत होकर अभिमन्यु सिंह इस्लाम कबूल कर दौलत खां हो गये । उन्हें जौनपुर के पूर्वी भागों के 22 परगने देकर जागीरदार बनाया गया , फिर १५०० घुडसवारों का सालार बनाकर मेहनगर राज्य का राजा बना दिया गया । शाहजहां के काल में भी दौलत खां एक सम्माननीय सिपहसालार थे । उनकी मौत कब कहां हुई , इसका कोई भी प्रमाण नहीं मिलता है , पर यह जरूर पता चलता है कि वह निःसंतान थे । उन्होंने अपने भाई सागर सिंह के बड़े बेटे हरिवंश स...

संकट एक वरदान B26

संकट एक मूसलाधार वर्षा की भांति होती है । काला घना बादल सम्पूर्ण आकाश को घेर लेता है । पूर्ण अंधकार छा जाती है । कड़कड़ाती बिजली सम्पूर्ण आकाश को अपनी बाहों में ले लेती है । आकाश बिजली से गरजता रहता है ।            पृथ्वी जल से भीग जाती है एवं भर जाती है । आप वर्षा के जल के कारण सरल चल भी नहीं पाते हैं।              जब वर्षा ठहरती है तब आकाश में इंद्रधनुष दिखता है। यह आनंद का प्रतिक होता है । मिट्टी के सुगन्ध से वातावरण आनंदित हो जाता है ।               संकट भी एक वरदान होता है । यह परीक्षा ईश्वर हर एक व्यक्ति की लेते हैं । जो व्यक्ति संकट का सामना करता है । उसी का "यश" - परिवार , समाज , पृथ्वी पर सदैव बढ़ता ही रहता है । -   पावन खिंड से प्रशांत जे के शर्मा. ।। जय श्री कृष्ण ।।

व्यवसाय प्रबंधन B25

" किसी व्यवसाय की सफलता का मूलमंत्र है - कंपनी केे लीडर को कार्ययोजनाओं पर अमल करवाना " ।  एवं किसी व्यवसाय में योजना बनाने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है उस पर अमल करना । ८०प्रतिशत व्यवसाय योजनाओं की कमी के बजाय उन्हें अमल में लाने की खामी से डूबते हैं। इस कारण कंपनी के लीडर को योजना के क्रियान्वयन पर अधिक समय देना चाहिए ।          किसी भी व्यवसाय की सफलता का मंत्र है कि "सही व्यक्ति को सही कार्य सौंपा जाए ।" व्यवसाय को सफल बनाने के लिए सबसे पहले लक्ष्य निर्धारित करें । यह लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए कि आखिर उससे क्या आशा करते हैं । तत्पश्चात कार्ययोजना बनाई जानी चाहिए ।          कार्ययोजना में डायरेक्टली रिस्पॉन्सिबल इंडिविजुअल्स ( डी आर आई )  का पालन करना जरूरी है । इसमें यह तय होता है कि किस काम के लिए कौन जिम्मेदार है । काम की जिम्मेदारी देने के साथ ही 'की परफॉर्मेंस इंडिकेटर्स ' (के पी टी )  का निर्धारण होना चाहिए । इसमें हर व्यक्ति के काम के स्तर की गणना होती है । हर सप्ताह इसका आंकलन होना चाहिए । इसके माध्यम से ही पुरस...

शक्तिशाली B24

 यस्याश्वा तस्य राज्यं , यस्याश्वा तस्य मेदिनी|  यस्याश्वा तस्य सौख्यं , यस्याश्वा तस्य साम्राज्यम्|                                        -    पावनखिंड से                               अर्थात " जिसके पास घोड़ा , उसके पास राज्य , उसके पास ऐश्वर्य ,उसके पास सुख , उसके पास साम्राज्य - वहीं होगा राजा " । राजे , जिसके पास यह सम्पत्ति होती है , उसका राज्य अजेय बना रहता है , यह कभी मत भूलना । यह बात राजा शहाजी भोसले ने अपने बेटे छत्रपति शिवाजी महाराज से बोली थी । राजा शहाजी के अनुसार उस समय घोड़ा एक वाहन तो था एवं साथ ही साथ वह शक्ति भी था ।           " कहने का तात्पर्य है - जिसके पास शक्ति (POWER) है , लोगों का संगठन है , वहीं भविष्य में शासन करेगा " । प्रशांत जे के शर्मा. ।। जय श्री कृष्ण ।।

समर्थन B23

यदि आप अपने साथ के लोगों के लिए ईर्ष्या , बैरभाव रखोंगे तो तुम्हारा काम नहीं चल सकेगा ।क्योंकि आज हो या कुछ वर्षों के पश्चात आपको इन्हीं लोगों के समर्थन , सलाह से एक एक कदम आगे बढ़ाना होगा । प्रशांत जे के शर्मा. ।। जय श्री कृष्ण ।।

साथ B22

यदि संकट में कोई भी अपने भाई का साथ छोड़ दें तो उस पर सहज विश्वास नहीं करना चाहिए। एवं यदि शरीर में कोई रोग बीमारी हो जाती है तो उसके चलते उस अंग को कोई काट नहीं देता । उसी प्रकार भाई जैसा भी हो उसका साथ नहीं छोड़ना चाहिए । क्योंकि कुटुम्ब , वैभव , सुख - शांति , साम्राज्य का वास्तविक सुख भाई के साथ के कारण प्राप्त होती है । "यहीं साथ परिवार का महागठन करता है" प्रशांत जे के शर्मा. ।। जय श्री कृष्ण ।। @Copyright

जड़ B21

आज वर्तमान में कमाने के लिए सभी लोग अपना घर गांव छोड़कर बाहर महानगर चले गए हैं । दादा ,परदादा , पिता ने गांव पर खेती , जमीन , जायदाद सब बनाया हैं । कमाने की धुन में सभी महानगरों में जाकर गांव को भूल रहे हैं परंतु समय - समय पर हम आप समय निकालकर गांव जाकर वहां की देखभाल करते हैं । सभी समाज के लोगों से , नात- रिश्तेदारों से मिलते है समाज के शादी समारोह , त्योहार , जीवन-मरण में सम्मलित होते हैं । इससे हम अपने गांव के जड़ से जुड़े रहते है। समाज में आने जाने से व्यक्ति के परिवार , खानदान को जाना जाता है । जब आप अपने बच्चों को समाज में सबसे मिलवाते है तो आपका परिवार गांव के जड़ से  जुड़ा रहता है एवं जाना जाता है । आज आपको महानगर में कितने लोग जानते है ? वहीं गांव में आपको आपके खानदान, परिवार, नात - रिश्तेदारों , समाज के लोगों से जाना जाता है । जब हम अपने गांव के लोगों के विवाह समारोह , जीवन मरण , त्योहार में आना जाना बंद कर दें तो धीरे धीरे सब समाप्त हो जाएगा। आपका जड़ आप का गांव है , यदि जड़ समाप्त तो वृक्ष समाप्त । आप अपने जड़ अपने गांव से जुड़े रहें । वही आपकी पहचान एवं शक्ति है । प्रशांत जे क...

भगवान परमहंस B20

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स्वामी श्रीरामकृष्ण परमहंस भगवान एवं माँ सारदा देवी अपने१६ शिष्यों के साथ , साष्टांग प्रणाम देव भक्ति दो प्रभु , दया करो प्रभु     🙏🌼🌺🌻🌺🌼🙏

ऐसा दान ना करें B19

ग्रहों की स्थिति के विपरीत यदि दान कर्म किया जाए तो वह और भी बुरा प्रभाव देता है , ऐसे में हमारे द्वारा किया गया दान हमें अच्छा फल देने की बजाय , बुरा फल देना आरंभ कर देता है और हमें इस बात का पता भी नही चलता । ज्योतिष विद्या के अनुसार जन्म कुंडली में जो ग्रह उच्च राशि या अपनी स्वयं की राशि में स्थित हो , उनसे सम्बंधित वस्तुओं का दान व्यक्ति को कभी भूलकर भी नहीं करना चाहिए । यह दान हानि ही देगा , आवश्यक है दान उसी व्यक्ति को करें जो व्यक्ति दान की गई वस्तु का उपयोग करें । प्रशांत जे के शर्मा. ।। जय श्री कृष्ण ।।

७ विशेष दान B18

हम कुछ विशेष छोटे उपाय कर  आवश्यक दान कर के जीवन के समस्या का समाधान कर सकते है - १- स्वास्थ्य एवं आयु की समस्या के लिए -       अन्न एवं जल का दान करें । २- दुर्घटना से रक्षा के लिए -      काले तिल का दान करें । ३- रोज़गार की प्राप्ति के लिए -      प्रकाश का दान करें ( तुलसी के नीचे या मंदिर में दीपक       जलाएं ) । ४- शीघ्र विवाह के लिए -      सुहाग की वस्तुओं का दान करें । ५- संतान प्राप्ति के लिए -      वृक्ष लगाएं एवं नियमित जल दान करें ( जल डालें ) । ६- मुक़दमे में विजय प्राप्ति के लिए -      मीठी वस्तुओं ( मिष्ठान ) का दान करें । ७- दुर्भाग्य दूर करने के लिए -      अन्न का दान करें । ये कुछ छोटे विशेष उपाय करने से हम अपने जीवन को सरल बना सकते है एवं अपने घर परिवार को सुख शांति दे सकते है । प्रशांत जे के शर्मा. ।। जय श्री कृष्ण ।। @Copyright

धर्म - पूजा पाठ B17

अमावस्या पर भगवान शनिदेव की आराधना से दीप दान करने पर आपके जीवन से आर्थिक संकट दूर होंगे , सुख शांति की  प्राप्ति होती है ,  वैवाहिक दाम्पत्य जीवन में सुख शांति प्रेम प्रसंग में लाभ होता है । भूमि , भवन , वाहन , संपत्ति , सुख प्राप्त होता है । भगवान शनिदेव न्याय के देवता हैं शनिदेव भगवान को प्रसन्न करने के लिए जप , तप , उपवास , दान , के साथ साथ सात्विक जीवन शैली होनी चाहिए । प्रशांत जे के शर्मा. ।। जय श्री कृष्ण ।।

संरचना B16

जब अपने अपनों का सुनना बंद कर दें तो समझ लीजिए की आपके परिवार के संरचना (ढाचे) का विनाश आरंभ हो चुका है। प्रशांत जे के शर्मा. ।। जय श्री कृष्ण ।। @Copyright

धर्म- पूजा पाठ B15

दैत्य गुरु शुक्र देवता को प्रसन्न करने हेतु आपको गाय सेवा , दान , व कन्या को उपहार देना चाहिए।  लाभ - आपको वाहन एवं भवन की प्राप्ति होती है । ।। जय श्री कृष्ण ।।