Shri Neeb karori maharaj Part-2 B229


उत्तराखण्ड में हनुमान मंदिरों की स्थापना:- नीब करौरी बाबा द्वारा सम्पन्न 

उत्तराखण्ड-वासियों की अपने प्रति निष्ठा, सहज-प्रेम और अफ्नत्व के प्रतिदान स्वरूप महाराज जी ने भी उनके प्रति अपने अमर प्रेम की प्रतिमूर्तियाँ श्री बजरंगगढ़ हनुमान मंदिर (नैनीताल)तथा श्री कैंची हनुमान मंदिर(निकट भीम ताल) एवं आश्रम उन्हें प्रदान कर दिये, जिनका सूक्ष्म में वर्णन प्रस्तुत है

बजरंगगढ़:- बजरंगगढ़ उत्तराखण्ड में बाबा जी द्वारा स्थापित प्रथम हनुमान-मंदिर है। नैनीताल से डेढ़ कि०मी० दूर स्थित नैनीताल हल्द्वानी मोटर मार्ग में घाटी नामक स्थान में बजरी के एक ऊँचे पहाड़ी टीले को बाबा जी ने इस मंदिर की स्थापना  की ।चबूतरे के ऊपर (गुफा का कुछ भाग लिये) हनुमान जी का मंदिर बन गया जिससे सटकर श्री लक्ष्मी-नारायण मंदिर, शिव मंदिर और कीर्तन भवन (जिसके एक भाग में बाद में बाबा जी ने श्री वैष्णवी दैवी के मंदिर की स्थापना की व्यवस्था कर दी थी) देखते-देखते खड़े हो गये। साथ में कुछ आवासीय कुटियों भी बन गई। बीहड़ जंगल एवं बड़ी-बड़ी चट्टानें हटाकर भूमि को समतल कर, दक्षिण की ओर कुछ ऊँचाई में अद्वैत आश्रम भी बन गया। विभिन्न कुटियों के नाम क्रमशः राधा कुटी, कृष्ण कुटी, विष्णु कुटी, कृष्ण-बलराम कुटी, गोविन्द कुटी, आदि रखे गये । हनुमान जी के मंदिर के पीछे गुफा में अब भी हवन कुण्ड पूर्ण रूपेण सुरक्षित है। कैंची धाम में ही उत्तराखण्ड में प्रवास के मध्य रहने लगे थे। भक्तों, भण्डारों, भजनों, कीर्तनों की दिनों दिन वृद्धि होने से दोनों स्थानों में धूम मच गई। कैंची धाम के प्रतिष्ठापन का दिन महाराज जी ने प्रारम्भ से ही १५ जून नियत कर दिया था जब वहाँ हनुमान जी की तथा अन्य मंदिरों में प्रतिष्ठित मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा सम्पन्न हुई थी और यह १५ जून सदा के लिये कैंची धाम में शुद्ध घी में बने मालपूओं के भण्डारे के लिये प्रसिद्ध हो गया, जिसमें हजारों की संख्या में दर्शनार्थी, श्रद्धालु एवं दूर दूर से आये भक्त गण छक कर प्रसाद पाते हैं, और बांध कर घर भी ले जाते हैं। इसी प्रकार १५ जून, १६७३ को श्री विन्ध्यवासिनी देवी और १५ जून, १६७४ को श्री वैष्णवी देवी के मंदिरों का भी प्रतिष्ठापन श्री कैंची धाम में मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा के साथ सम्पन्न हो गया। श्री विन्ध्यावासिनी मंदिर की स्थापना प्रभू स्वयँ करा गये थे तथा वैष्णवी देवी मंदिर की स्थापना का पूरा प्रबन्ध अपने निर्वाण (१० सितम्बर, १६७३) के पूर्व स्वयं ही कर गये थे । और जहाँ पूर्व में १५ जून के भण्डारे में ७-८ हजार की संख्या में भक्त-मण्डली तथा जनता सम्मिलित होती थी, अब उनकी संख्या बढ़ कर ३५-४० हजार से ऊपर जा चुकी है जबकि मंदिर दूर पहाड़ों में जंगलों के बीच साधारण से गाँव में नदी के पार स्थित है। बाबा जी कह भी तो गये थे देखना, एक दिन ऐसा आयेगा कि हजारों की संख्या में लोग कैंची धाम का प्रसाद पाने आयेंगे। अब तक पाश्चात्य देशों के सैकड़ों आते रहते हैं । भक्त एवं दर्शनार्थी भी धाम दर्शन को आ चुके हैं आगन्तुकों एवं विभिन्न आश्रमों से आये दर्शनार्थियों से यही सुनने को मिलता है कि धाम के प्रवेश द्वार से आगे बढ़ने पर ही परम शांति प्राप्त हो जाती है।  इनके अलावा बाबा जी ने प्रथम हनुमानजी मूर्ति गुजरात में मौरवी नामक क्षेत्र के बबानियाँ ग्राम में स्थापित किया , दूसरा नीब करौरी फरूंखाबाद में, तीसरा बजरंगगढ़- भूमियाधार-कैंचीधाम- काकड़ीघाट(नैनीताल)में चौथा वृन्दावन(मथुरा), इसके पश्चात हनुमान सेतु लखनऊ दो मंदिर ,पिथौरागढ़ में हनुमानजी मंदिर, पनकी (कानपुर), जौनापुर(दिल्ली) , तारादेवी(शिमला), पोर्ट ब्लेयर(अन्डमान), धारचूला निकट(नेपाल बॉर्डर)। सभी जगह हनुमानजी की मूर्ति व मंदिर की स्थापना के प्रेरणा स्रोत रहे हैं। जय नीब करौरी महाराज🙏🌹🙏

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