भाव का आत्मा से संबंध B112


 "भाव ही भाव होगा" और जहां भाव होता है वहीं भक्ति होती है। भक्ति में भाषा का महत्व नहीं होता है भाव का महत्व होता है। कहा गया है "भक्ति स्वतंत्र सकल गुण खानी, विनु सत्संग न पावही प्राणी।" और जब वह भाव विहवल होता है परमात्मा के लिये वह चिंतन शील होता है उसको यह समझ आ जाता है कि उसके बिना मेरा जीवन अधुरा है हमारे जीवन का श्रोत है जिसके इस शरीर से निकल जाने के बाद यह शरीर ज्यों का त्यों धरा का धरा रह जाता है।


फिर इस शरीर को समाज तो छोड़ दिजिये परिवार के लोग भी २-४ घण्टे से अधिक घर में रखना नहीं चाहते क्योंकि इसके अंदर से जीवात्मा निकल गया है यह निर्जीव हो गया है यह बेकार हो गया है। ऐसा क्यों? तो मनुष्य प्रेम किस से करता है। शरीर से करता है तो शरीर को रखना चाहिये ? परन्तु वह प्रेम किससे करता है जो निकल गया उस जीवात्मा से जिसके रहने पर वह एक दूसरे से प्रेम करता है एक दूसरे से प्रेम करता है एक दूसरे को भाई समझता है, पति पत्नी समझता है, माता पिता समझता है। एक दूसरे से प्रेम करता है यह रिश्ता किसका, यह देह का नहीं आत्मा का रिश्ता है किन्तु वह आत्मा न तो किसी का भाई होता है । न पिता होता है, न बंधु होता है। वह तो सर्वव्यापी है, ईश्वर का अंश है, ईश्वर का स्वरुप होता है किन्तु उसके रहने से ही शरीर का महत्व होता है यही तो हमें सत्य को समझना है और शरीर से अधिक उस मूल श्रोत को उस शक्ति को महत्व देना है जिसके रहने से इस शरीर का महत्व समाज में समझ में आता है।

🌹जय श्री कृष्ण🌹

🌼🌼जयश्री भगवान अवधूत राम जी🌼🌼

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